Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Wednesday, 18 May 2016

दादी या नानी माँ के घरेलू प्राथमिक उपचार

(इलायची का उपयोग)  १-   मुँह में छाले हो तो इलायची को पीसकर उसमें शहद मिलाकर लगाने से छाले ठीक होते हैं।

२-   २-३  ग्राम इलायची को पीसकर मिश्री मिलाकर लेने से पेशाब कम अाना या जलन होने की समस्या में शीघ्र लाभ होता है।

३-     हिचकी नहीं रुक रही हो तो २ इलायची व ३ लौंग को पानी में चाय की तरह थोड़ी देर उबाल कर पिलाने से लाभ होता है।यदि एक बार में ठीक नहीं हुआ तो यह प्रयोग दिन में ३-४ बार कर सकते हैं।

(काली मिर्च )-----१-  यदि खाँसी के कारण सो नहीं पा रहे हैं तो १-२ काली मिर्च मुँह में रखकर चूसते रहने से खाँसी में आराम हो जायेगा तथा नींद भी आ जायेगी।

२-      थोड़ा अदरक व ३-४ काली मिर्च मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से खाँसी में तुरन्त आराम होता है।

३--    शीतपित्त होने पर ४-५ कालीमिर्च पीसकर उसमें १ चम्मच गर्म घी और शक्कर मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।

४--   खाँसी व उसके साथ कमजोरी भी हो तो २० ग्राम कालीमिर्च, १०० ग्राम बादाम , १५० ग्राम मिश्री मिलाकर कूटकर पाउडर बनाकर किसी साफ शीशी में भरकर रख लें, सुबह - शाम गर्म दूध के साथ अथवा गर्म पानी से लेने से पुरानी खाँसी भी ठीक हो जाती है।इससे कमजोरी में भी लाभ होता है।


(मेथी का उपयोग-)-------

१-     एक चम्मच मेथी को एक कप पानी में भिगो दें। प्रात: उस पानी को पीकर मेथी को भी चबाकर खायें।मधुमेह में इससे लाभ होगा व इससे होने वाली कमजोरी, वातरोगों व हृदयरोग में भी फायदा होगा।

२---- मेथी , हल्दी  तथा सौंठ को बराबर मात्रा में लेकर पाउडर करके रखें। १-१ चम्मच सुबह -शाम गर्म पानी या गर्म दूध के साथ लेनें से जोड़ों के दर्द या सभी तरह के वात रोग या सूजन में लाभ होता है।

३---     पुराने अर्थराइटिस के रोगियों को लम्बे समय तक मेथी का प्रयोग करने से चमत्कारी लाभ होता है।

४---  आर्थराइटिस व मधुमेह के रोगियों को मेथी को अंकुरित करके भी प्रतिदिन सेवन करने से लाभ मिलता है।

५---  सर्दी तथा कफ में मेथी एवं अदरक का काढ़ा बनाकर पीने से लाभ होता है।


(अदरक का प्रयोग-)----- 

१--  भोजन के आरंभ में ३-४ छोटे टुकड़े अदरक लेने से भूख बढ़ती है तथा भोजन के पश्चात लेने से भोजन पचता है।

२--- २ चम्मच अदरक के रस में थोड़ा शहद मिलाकर लेने से सर्दी जुकाम एवं खाँसी में फायदा मिलता है।

३-----  यदि ठंढ से दाँत में दर्द हो तो एक टुकड़ा अदरक को दाँत में दबाकर रखने से तुरन्त लाभ मिलेगा।

४------  अदरक को भूनकर चूसने से खाँसी में लाभ होता है।

५-------   २-३ ग्राम सौंठ पाउडर में१/२ या १ ग्राम दालचीनी मिलाकर दूध या पानी के साथ लेने से पाचन ठीक रहता है तथा हृदय को ताकत मिलता है।

६------   अदरक के रस में नींबू का रस मिलाकर पीने से मन्दाग्नि दूर होकर भूख लगती है।

७-------  २ ग्लास पानी में ५ ग्राम अदरक कूटकर उबालकर उसमें नींबू का रस तथा थोड़ा शहद डालकर सुबह खाली पेट गुनगुना पीने से मोटापा कम होता है।

Tuesday, 17 May 2016

Jhanki Karne ko Aaj , Mai ShreeJee Ke Dwar Chali.


सपने को साकार बनाया, करके कृपा मुझे पास बुलाया ,
मुझ अनाथ को श्रीनाथ ने ,  देकर  प्रेम सनाथ बनाया ,
अपने पतिदेव के साथ चली ,   मेरी नैया पार लगी ।
झाँकी करने को आज मैं ,  श्रीजी के द्वार चली ।
बहुत दिनों के बाद ,       मेंरी    तकदीर  खुली  ,
झाँकी करने को आज ,  मैं श्रीजी के द्वार चली ।
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण-------------------।

मोर चन्द्रिका शीश पे सोहे , श्याम छवि सब का मन मोहे ,
मुझे हाथ से पास बुलावे ,  कटी हाथ में कमल धरावे ,
मेरी नाथ  नगरिया,  प्रभु की बगिया,  महके गली - गली,
झाँकी करने को आज , मैं   श्रीजी के   द्वार चली ।
बहुत दिनों के बाद-------------------- ।
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण --------------।


जाकर सन्मुख बैठ धरूँगी , निरख - निरख छवि दरश करूँगी ,
सेवा करके श्रीनाथ की    ,  जीवन अपना सफल करूँगी ,
माला भी मैं गूथूँगी  ,   चुन -  चुन कर  कली - कली ।
झाँकी करने को आज मैं ,  श्रीजी के द्वार चली ।
बहुत दिनों के बाद ----------------- ।
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण -------------।





Tuesday, 29 March 2016

अजवायन के गुण ।

अजवाइनको पीस कर त्वचा पर लगाने से त्वचा रोग दूर होता है।

२- फोड़ा फुन्सी में अजवाइन को पीस कर नींबू के साथ लगाने से भी आराम मिलता है।

३- पित्त रोग में अजवाइन गुड़ लेने से पित्त रोग ठीक हो जाता है।

४- यदि सर्दी लगी हो तो अदरक का रस शहद के साथ बराबर मात्रा में लेने से आराम मिलता है।

५-  जो ज्यादा अल्कोहल पीते हैं, तथा अब वो अल्कोहल वाला शराब छोड़ना चाहते हैं तो १/२ किलो ग्राम . अजवायन को ४ लीटर पानी में पकाकर जब दो लीटर बच जाये तो छानकर रख लें त़था प्रतिदिन भोजन के पहले १-१ कप पीयें।इससे लीवर ठीक रहेगा तथा शराब पीने की इच्छा भी कम होगी।

६-  २-३ ग्राम अजवायन को पाउडर करके छाछ के साथ लेने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते है।

७-  प्रसूता स्त्री के लिये १० ग्राम अजवायन को १ लीटर पानी में पकाकर १/४ शेष रहने पर छानकर सुबह - शाम पिलाने से प्रसूतिजन्य विकार नहीं होते।इससे बढ़ा हुआ शरीर भी अपनी स्थिति में वापस आ जाता है।

८-   १० ग्राम अजवायन को बारीक पीसकर उसमें १/२ नींबू का रस निचोड़ कर डालें, ५ ग्राम फिटकिरी पाउडर व छाछ को मिलाकर बालों में मलने से रूसी कम होता है तथा जुएँ भी मर जाती है।

Tuesday, 8 March 2016

ShreeRadhaRani Tatha Unki Asht Sakhiyan



श्रीराधारानी - चरण   बंदौं    बारंबार  ।
जिन के कृपा कटाच्छ तैं  रीझैं  नंदकुमार ।।

जिनके पद - रज - परस तें स्याम होयँ बेभान ।
बंदौं तिन पद - रज -कननि मधुर रसनि के खान।।

जिनके दरसन हेतु नित , बिकल रहत घनस्याम ।
 तिन  चरनन  मैं  बसै  मन  मेरौ आठौं  याम  ।।

जिन  पद  पंकज  पै  मधूप  मोहन  दृग  मँडरात।
तिन  की  नित झाँकी करन  मेरौ   मन ललचात ।।

' रा '  अक्षर  कौं  सुनत  हीं  मोहन  होत  बिभोर ।
बसैं   निरन्तर  नाम  सो ' राधा ' नित  मन  मोर ।।

     दो०--- बंदौं   श्रीराधाचरन  पावन  परम  उदार ।
               भय -बिषाद -अग्यान हर प्रेमभक्ति- दातार।।

श्री 'ललिता ' --- श्री ' ललिता ' लावण्य ललित सखि
      गोरोचन     आभा     युत   अंग   ।
      बिद्युदवर्णि      निकुंज - निवासिनि ,
     वसन      रुचिर  शिखिपिच्छ  सुरंग ।।
     इन्द्रजाल - निपुणा ,  नित    करती 
     परम    स्वादु     ताम्बूल    प्रदान   ।
     कुसुम - कला - कुशला , रचती कल
    कुसुम - निकेतन       कुसुम - वितान ।।

सखी ' विशाखा ----- सखी ' विशाखा विद्युत - वर्णा ,   
      रहती   बादल - वर्णा     कुँज 
    तारा - प्रभा     सुवसन  सुशोभित ,
    मन  नित  मग्न  श्याम - पद - कंज ।।
    कर्पूरादि      सुगन्ध - द्रव्य    युत
  लेपन    करती     सुन्दर     अंग ।
    बूटे - बेल     बनाती ,     रचती
   चित्र     विविध  रूचि  अँग - प्रत्यंग।।

' चित्रा ' --- अंग -  कांति    केसर  सी
      काँच  प्रभा  से  वसन  ललाम।
       कुंज - रंग  किंजल्क  कलित अति,
       शोभामय    सब    अंग   सुठाम   ।।
       विविध    विचित्र  वसन - आभूषण
       से    करती     सुन्दर     श्रृंगार   ।
       करती         सांकेतिक     अनेक
         देशों   की  भाषा  का  व्यवहार ।।

सखी ' इन्दुलेखा ' ----- सखी ' इन्दुलेखा ' शुचि करती
शुभ - वर्ण  शुभ  कुंज  निवास ।
अंग  कांति  हरताल  सदृश रँग 
दाड़िम  कुसुम  वसन  सुखरास ।।

करती  नृत्य  विचित्र  भंगिमा
संयुत  नित  नूतन  अभिराम ।
गायन  विद्या  निपुणा , व्रज की
ख्यात    गोपसुन्दरी   ललाम  ।।

 'चंपकलता '------ कांति   चम्पा सी, 
कुंज   तपे  सोने   के    रँग ।
नीलकण्ठ   पक्षी  के  रँग  के,
रुचिर   वसन  धारे  शुचि  अँग।।
चावभरे   चित   चँवर   डुलाती
अविरत   निज   कर - कमल  उदार ।
द्युत - पंडिता ,  विविध   कलाओं
से     करती   सुन्दर    श्रृंगार    ।।

सखी ' रंगदेवी '------- सखी रंगदेवी बसती अति
रुचिर    निकुंज ,  वर्ण  जो  श्याम  ।
कांति   कमल  केसर  सी  शोभित ,
जवा   कुसुम - रँग   वसन   ललाम  ।।
नित्य   लगाती   रुचि   कर - चरणों 
में     यावक     अतिशय   अभिराम ।
अास्था    अति   त्यौहार   व्रतों   में ,
कला - कुशल    शुचि    शोभाधाम  ।।

सखी ' तुंगविद्या ' ------- सखी  तुंगविद्या  अति  शोभित
कान्ति   चन्द्र ,  कुंकुम  सी  देह ।
वसन   सुशोभित  पीत  वर्ण  वर ,
अरुन  निकुंज ,  भरी   नव   नेह  ।।
गीत -वाद्य   से   सेवा   करती
अतिशय     सरस    सदा  अविराम ।
नीति - नाट्य - गन्धर्व  - शास्त्र --
निपुणा    रस    आचार्या    अभिराम ।।

सखी ' सुदेवी '----- सखी ' सुदेवी ' स्वर्ण- वर्ण - सी, 
वसन   सुशोभित  मूँगा  रंग ।
कुंज   हरिद्रा -  रंग   मनोहर
करती     सकल   वासना - भंग ।।
जल  निर्मल  पावन  सुरभित  से 
करती    जो    सेवा    अभिराम ।
ललित   लाड़ली की  जो  करती
बेणी -  रचना    परम     ललाम  ।।

अष्ट   सखी  करतीं  सदा , सेवा  परम  अनन्य ।
राधा - माधव - युगल की , कर  निज जीवन धन्य।।
इनके  चरण  सरोज  में  ,   बारम्बार     प्रणाम। 
करूणा  कर  दें  श्रीयुगल - पद - रज - रति  अभिराम ।।
                     



Wednesday, 2 March 2016

SreeRadhaJee Ki Aarti.

आरती    श्रीबृषभानु  लली    की ।
सत - चित - आनंद-  कंद - कली     की ।। टेक ।।

भयभंजिनि     भव - सागर - तारिनि ,
पाप - ताप - कलि - कल्मष - हारिनि , 
  दिब्यधाम - गोलोक -  बिहारिनि ,
जनपालिनि     जगजननि    भलीकी  ।। १ ।।

अखिल  बिस्व  आनंद - बिधायिनि , 
 मंगलमयी            सुमंगलदायिनि ,
  नंदनंदन - पद - प्रेम    प्रदायिनि ,
अमिय - राग - रस - रंग - रलीकी ।।२ ।।

नित्यानंदमयी     अाह्लादिनि ,
आनंदघन - आनंद - प्रसाधिनि ,
रसमयी ,   रसमय - मन - उन्मादिनि ,
सरस   कमलिनि  कृष्ण - अलीकी ।। ३ ।।

नित्य  निकुंजेस्वरी  रासेस्वरि ,
परम   प्रेमरूपा    परमेस्वरी , 
गोपिगणाश्रयि       गोपिजनेस्वरि ,
बिमल - बिचित्र - भाव - अवलीकी ।। ४ ।।

                     ------------------ ० ----------------

Wednesday, 17 February 2016

Short Story Of Maharshi Valmeekijee. ( महर्षि वाल्मीकिजी की संक्षिप्त कथा ।)

एक समय की बात है , महर्षि वाल्मीकि वन में विचरण कर रहे थे । वन की शोभा अत्यन्त रमणीय थी ।वन में तरह - तरह के जीव - जन्तु तथा पक्षियों का बसेरा था।महर्षि जहाँ खड़े थे , उनके पास ही दो सुन्दर पक्षी स्नेहपूर्ण भाव से एक दूसरे के साथ रमण कर रहे थे।दोनों आपस में बहुत ही खुश लग रहे थे।उसी समय एक व्याध वहाँ आया और दोनों मे से एक को निर्दयतापूर्वक बाण से मार गिराया।यह देख महर्षि को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने वहीं बह रही सरिता का पवित्र जल हाथ में लेकर उस ब्याध को शाप दिया - ओ निरपराध पक्षी की हत्या करने बाले , तुझे कभी शाश्वत शान्ति नहीं मिलेगी, क्योंकि तूने इन पक्षियों में से एक को मारकर , जो काम से मोहित हो रहा था,दूसरे को एकाकी कर दिया।
                       यह वाक्य छन्दोबद्ध श्लोक के रूप में अचानक महर्षि के मुख से निकला, मुनि के शिष्य जो आस- पास थे प्रसन्न होकर कहने लगे , मुनिश्रेष्ठ यह छन्द तो बहुत सुन्दर श्लोक बन गया है।उसी समय ब्रह्माजी वहाँ प्रगट हुए और वाल्मीकिजी से कहने लगे,महर्षि ! आप धन्य हैं सरस्वतीजी आपके मुख में विराजमान होकर श्लोक रूप में प्रकट हुई हैं।इसलिये अब आप मधुर अक्षरों में सुन्दर रामायण की रचना कीजिये।मुख से निकलने वाली वही वाणी धन्य है जो श्रीरामनाम से युक्त हो।अत: आप अयोध्या के राजा दशरथजी के पुत्र श्रीरामचन्द्रजी के लोक प्रसिद्ध चरित्र को लेकर काव्य रचना कीजिये, जिससे आगे चलकर पग - पग पर पापियों के पाप का निवारण होगा।इतना कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये।
                          एक दिन वाल्मीकिजी नदी तट पर ध्यान में थे कि श्रीराम उनके हृदय में प्रकट हुये।नील पद्मदल के समान श्याम विग्रह वाले कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन पाकर मुनि बड़े प्रसन्न हुये।मुनि को उनका भूत,वर्तमान तथा भविष्य तीनों काल के चरित्र का साक्षातकार हुआ।उसके बाद वाल्मीकिजी ने प्रभु श्रीराम की आज्ञासे रामायण की रचना सुन्दर छन्दों में किया।रामायण में ६: काण्ड हैं--- बालकाण्ड , आरण्यककाण्ड , किष्किन्धाकाण्ड , सुन्दरकाण्ड , युद्धकाण्ड , तथा उत्तरकाण्ड ।
 बालकाण्ड---- बालकाण्ड में राजा दशरथ के चार पुत्र , जो उन्होंने पुत्रेष्ठि यज्ञ करके प्राप्त किये थे । भगवान विष्णु अपने अंशो सहित उनके चारों पुत्रों के रूप में राजा दशरथ के घर पधारे थे।चारों भाईयों के गुरूकुल शिक्षा , उनके गुरू वशिष्ठ के आश्रम में होने के पश्चात, गुरू विश्वामित्र के यज्ञ में जाना , वहाँ से मिथिला में जाकर धनुष भंग कर राजा जनक की पुत्री सीता संग विवाह करना, अयोध्या में युवराज पद पर अभिषेक होने की तैयारी , और तत्पश्चात माता कैकेयी के कहने से प्रभुश्रीराम का अपने अनुज तथा पत्नी सीता के साथ वन जाना , गंगा पार करके चित्रकूट पर्वत पर सीता और लक्ष्मण के साथ निवास करना अादि प्रसंगों का उल्लेख है।उनके छोटे भाई भरत को जब ये ज्ञात होता है कि प्रभु श्रीराम उनकी कारण वन चले गये हैं तो वे उन्हें मनाने चित्रकूट पर्वत पर जाते हैं, और जब वे रामजी को नहीं लौटा सके तो स्वयं भी अयोध्या का राजभवन छोड़ कर नंदिग्राम में कुटिया बनाकर वास करते हैं।
      आरण्यकाण्ड ------अरण्यकाण्ड में प्रभु श्रीराम अपने भाई लक्षमण तथा पत्नी सीता के साथ वन में निवास करते हैं , तथा ऋषि मुनियों के दर्शन करते हैं ।पंचवटी में रहते हुये सूर्पनखा का लक्षमण द्वारा नाक काटना, खर और दूषण का विनाश , मारीच जो माया से सोने का हिरण बनकर आया था, उसका भी बध करना , रावण के द्वारा सीताजी का हरण, श्रीराम का विरहाकुल होकर सीता की खोज में वन - वन भटकना तथा मानव की तरह ही लीला करना ,कबन्ध से मुलाकात, शबरी की कुटिया में जाकर उन्हें दर्शन देना , पम्पासरोवर पर जाना और फिर हनुमानजी से मिलना ये सभी कथायें अारण्यकण्ड में आते हैं।

         किष्किन्धाकाण्ड ------ किष्किन्धाकाण्ड में सुग्रीव से मिलना, बालि का अद्भुत बध तथा सुग्रीव का लक्षमण द्वारा राज्यभिषेक तथा कर्तव्यपालन का संदेश देना सुग्रीव द्वारा सैन्यसंग्रह कर सीताजी की खोज में वानरों का भेजा जाना, सम्पाति से वानरों की भेंट , जामवंतजी द्वारा हनुमानजी को समुद्र लाँघने के लिये प्रेरित करना और फिर हनुमानजी का समुद्र लाँघकर लंका में प्रवेश करना ये सभी प्रसंग आता है।

सुन्दरकाण्ड------- सुन्दरकाण्ड जिसे रामायण का हृदय स्वरूप कहा गया है जहाँ प्रभु श्रीराम की अद्भुत कथा का वर्णन है।हनुमानजी का माता सीता की खोज लंका भवन में घूम-घूम कर प्रत्येक स्थान पर करना , विभीषन से मिलना, लंका में रहते हुये भी विभीषण का श्रीराम की भक्ति करना ,विभीषण की सहायता से सीताजी का अशोक वाटिका में दर्शन करना तथा रामजी का संदेश देना ,अशोक वाटिका का विध्वंस , लंका के राक्षसों द्वारा हनुमानजी का बंधन तथा उनके पूँछ में अाग लगाना, हनुमानजी के द्वारा लंका दाह और फिर सीतामाता का संदेश तथा चिन्ह स्वरूप चूड़ामणि लेकर वापस समुद्र लाँघकर आना वानरों से मिलना , प्रभु श्रीराम को सीताजी के द्वारा दी हुई चूड़ामणि अर्पण करना , रामजी की सेना का लंका के लिये प्रस्थान , समुद्र में पुल बाँधना , सेना में रावण के दूत , शुक और सारण का छल से प्रवेश , ये सभी प्रसंग सुन्दरकाण्ड में दिया गया है।

                    

Tuesday, 9 February 2016

Bhakt prahlad Ki Nyaypriya Katha. ( भक्त प्रह्लाद की न्यायप्रिय कथा ।)

प्रह्लाद पुत्र विरोचन , केशिनी नाम की एक अनुपम सुन्दरी कन्या के स्वयंवर में विवाह की इच्छा से पहुँचा।केशिनी सुधन्वा नाम के ब्राह्मण से विवाह करना चाहती थी।केशिनी ने विरोचन से पूछा -- विरोचन ! ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं या दैत्य ? यदि ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं , तो मैं ब्राह्मण पुत्र सुधन्वा से ही विवाह करना पसंद करूँगी ।विरोचन ने कहा , हम प्रजापति की श्रेष्ठ संतानें हैं, अत: हम सबसे उत्तम हैं । हमारे सामने देवता भी कुछ नहीं हैं तो , ब्राह्मण श्रेष्ठ कैसे हो सकते हैं।

           केशिनी ने कहा इसका निर्णय कौन करेगा? सुधन्वा ब्राह्मण जानता था कि ,दैत्य राज प्रह्लाद यहाँ के राजा हैं तथा धर्मनिष्ठ भी।अत: प्रह्लाद जी के पास जाने का प्रस्ताव सुधन्वा ने रखा।विरोचन को विश्वास था कि पिताजी तो निर्णय अपने पुत्र के पक्ष में ही देंगे।अत: विरोचन तथा सुधन्वा ने प्राणों की बाजी लगा लिया ।अब केशिनी सुधन्वा तथा विरोचन तीनों प्रह्लाद जी  की सभा में पहुँचे।

        प्रह्लाद ने अपने सेवकों से सुधन्वा ब्राह्मण के सत्कार के लिये जल तथा मधुपर्क मँगाया तथा बड़े ही भाव  से ब्राह्मण के चरण धुलवाकर आसन बैठने को दिया तथा पूछा कि आपने यहाँ आने का कष्ट कैसे किया? सुधन्वा ने कहा ! मैं तथा आपका पुत्र विरोचन प्राणों की बाजी लगाकर यहाँ अाये हैं , कि क्या ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अथवा विरोचन ?

                प्रह्लादजी यह सुनकर गंभीर हो गये।उन्होंने कहा , ब्रह्मण ! मेरे एक ही पुत्र है और इधर धर्म , मैं भला कैसे निर्णय दे सकता हूँ ? विरोचन ने कहा - राजन ! नीति जो कहती है , उसके आधार पर ही निर्णय कीजिये ।प्रह्लादजी ने अपने पुत्र से कहा-- विरोचन ! सुधन्वा के पिता  ऋृषि अंगिरा , मुझसे श्रेष्ठ हैं , इनकी माता , तुम्हारी माता से श्रेष्ठ हैं तथा सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ है । अत: तुम सुधन्वा से हार गये हो।सुधन्वा आज से तुम्हारे प्राणों का मालिक है।

              सुधन्वा बोला-- प्रह्लाद !तुमने स्वार्थवश असत्य नहीं कहा है। तुमने धर्म को स्वीकार करते हुये न्याय किया है , इसलिये  तुम्हारा पुत्र मैं तुम्हें लौटा रहा हूँ लेकिन केशिनी के समक्ष इसे मेंरा पैर धोना पड़ेगा।विरोचन समझ गया , और स्वेक्षा से सुधन्वा ब्राह्मण के पैर धोकर आशीर्वाद लिया।