Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Wednesday, 15 February 2017

वेदसारशिवस्तोत्रम्


    

पशुनां  पतिं  पापनाशं  परेशं
          गजेन्द्रस्य  कृत्तिं  वसानं  वरेण्यम्  ।
जटाजूटमध्ये     स्फुरदगांगवारिं 
                    महादेवमेकं  स्मरामि  स्मरामि ।।

  पशुओं ( समस्त प्राणिमात्र )   के पति ( रक्षक ) , त्रिविध-ताप -पाप को नष्ट करनेवाले, परमेश्वर स्वरूप एवं कजचर्म धारक , सर्वश्रेष्ठ तथा अपने जटा-जूट में गंगा को लहराने वाले, कामदेव के विनाशक , ऐसे एकमात्र शिव का मैं स्मरण करता हूँ ।।१ ।।

महेशं   सुरेशं   सुरारातिनाशं
          विभुं    विश्वनाथं   विभूत्यंगभूषम्  ।
विरूपाक्ष - मिन्द्वर्क - वह्निं  त्रिनेत्रं 
               सदानंदमीडे   प्रभुं   पंचवक्त्रम् ।।२ ।।

महेश, देवताओं के स्वामी ( सुरेश ) तथा समस्त देवताओं के कष्ट विनाशक, व्यापक , समस्त चराचर के स्वामी भगवान विश्वनाथ अपने समस्त अंगों में विभूति धारण किये हुये , विरूपाक्ष , चन्द्र - सूर्य - वह्निरूप, त्रिनेत्रधारी , सदानंद मग्न , पंचमुख वाले प्रभु शिव की मैं स्तुति करता हूँ।

गिरीशं   गणेशं   गले   नीलवर्णं
          गवेन्द्राधिरूढं     गुणातीतरूपम  ।
भवं    भास्वरं  भस्मना   भूषिताड़्गं
            भवानीकलत्रं   भजे   पंचवक्त्रम्  ।।३ ।।

आप कैलाश पर्वत के स्वामी , प्रमथादि गुणों के ईश ,  नीलकंठ स्वरूप , वृषभ ( नन्दी ) पर आरूढ़ , अगणित स्वरूप धारण करने वाले , संसार के आदिकारण भूत , अत्यन्त तेजस्वी , भस्मधारण से विभूषित विग्रह वाले , पार्वती जिनकी अर्धांगिनी हैं , ऐसे पाँच मुखवाले महादेवजी को मैं भजता हूँ।

 शिवाकान्त   शम्भो   शशांकार्धमौले
                  महेशान  शूलिन्  जटाजूटधारिन्  ।
त्वमेको  जगद् - व्यापको  विश्वरूप
                   प्रसीद  प्रसीद   प्रभो   पूर्णरूप ।।४ ।।

हे पार्वतीनाथ ! शम्भो ! हे चन्द्रशेखर ! हे त्रिशूलधारक ! जटाजूटधारिन ! हे विश्वरूप ! समस्त चराचर संसार में आप एकमात्र व्यापक हैं , ऐसे हैं पूर्णरूप प्रभु शिवशंकर , आप मुझपर प्रसन्न होइए ।

  परात्मानमेकं   जगद् - बीजमाद्यं
                  निरीहं     निराकारमोंकारवेद्यम् ।
   यतो     जायते    पाल्यते     येन    विश्वम् 
               तमीशं  भजे  लीयते  यत्र   विश्वम्  ।।५ ।।

आप परमात्मा स्वरूप , अद्वितीय , जगत्  केआदि कारण , इच्छा - रहित , निराकार तथा प्रणव ( ओंकार ) द्वारा ही वेद्य हैं , आप ही जगत् के उत्पादक , पालक एवं लय करने वाले हैं , ऐसे महादेवजी को मैं भजता हूँ ।

  न  भूमिर्न  चापो  न  वह्निर्न  वायु -
                र्न    चाकाशमास्ते  न  तन्द्रा  न  निन्द्रा  ।
  न  ग्रीष्मो  न  शीतं  न  देशो  न  वेषो
                 न   यस्याअस्ति   मूर्तिस्त्रिमूर्तिं  तमीडे ।।६ ।।

जो न पृथ्वी , जल , अग्नि  वायु  है  तथा जो न  आकाश एवं तन्द्रा और निद्रा है , उसी प्रकार जो न ग्रीष्म न शीत है और जिनका न कोई देश है , ऐसे मूर्ति रहित त्रिमूर्ति ( सत्व , रज, तम ) रूप शिव का मैं  स्तुति  करता हूँ ।

अजं  शाश्वतं  कारणं  कारणानां
शिवं  केवलं  भासकं  भासकानाम्  ।
तुरीयं            तम:पारमाद्यन्तहीनं 
प्रपद्ये    परं    पावनं    द्वैतहीनम्  ।।७ ।।

आप अजन्मा , नित्य तथा कारण के भी कारण रूप हैं आप ही कल्याण स्वरूप , अद्वितीय हैं , आप ही प्रकाश को भी प्रकाश करने वाले हैं , आप अवस्था त्रय से रहित तुरीयावस्था में ही सर्वदा स्थित हैं एवं आप अज्ञान से भी परे , अनादि एवं अनन्त हैं , ऐसे परम पावन , द्वैत रहित , (अद्वैत रूप ) आपकी शरण में रहकर मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

नमस्ते  नमस्ते  विभो  विश्वमूर्ते !
          नमस्ते  नमस्ते  चिदानन्दमूर्ते ! ।
नमस्ते  नमस्ते  तपोयोगगम्य
           नमस्ते  नमस्ते  श्रुतिज्ञानगम्य ।।८ ।।

हे विश्वमूर्ति ! हे विभु ! आपको नमस्कार है । हे चिदानन्द मूर्तिरूप शिव ! आपको मेरा नमस्कार है , हे तप एवं योगगम्य प्रभो ! आपको नमस्कार है तथा हे वेदविद् भगवान् ! आपको मेरा नमस्कार है ।

प्रभो  शूलपाणे  विभो  विश्वनाथ !
        महादेव  शम्भो  महेश  त्रिनेत्र ।
 शिवाकान्त   शान्त   स्मरारे   पुरारे !
                 त्वदन्यो  वरेण्यो  न  मान्यो  न  गण्य: ।।९ ।।

हे प्रभो !  शूलपाणि !  विभु !  विश्वनाथ !  महादेव ! शम्भु ! हे महेश ! हे त्र्यम्बक ! हे शिवा ( पार्वती ) वल्लभ ! हे शान्तरूप ! हे कामादि तथा त्रिपुरारी ! आपके अतिरिक्त न तो कोई भी देवगणों में श्रेष्ठ है न मान्य है एवं गणनीय भी कोई नहीं है ।

शम्भो महेश करूणामय शूलपाणे !
         गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ! ।
काशीपते करूणया जगदेतकेक-
           स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोअसि ।। १० ।।

हे शम्भो ! हे महेश ! हे करूणा - वरूणालय ! हे शूलपाणि , हे गौरीपति , पशुपति , हे संसार के पाश विध्वंसक ! हे काशीपति ! आप ही एकमात्र इस जगत् के उत्पत्ति , स्थिति एवं लयकारक हो तथा आप ही एकमात्र इस जगत् के स्वामी हो।

त्वत्तो  जगद्  भवति देव  भव  स्मरारे !
          त्वय्येव  तिष्ठति  जगन्मृड  विश्वनाथ ! ।
त्वय्येव  गच्छति  लयं  भजदेतदीश !
            लिंगात्मकं  हर  चराचरविश्वरूपिन् ! ।।११ ।।

हे देव ! हे शंकर ! हे कन्दर्प- दर्पविदारक ! हे ईश ! हे विश्वनाथ ! हे हर ! यह लिंग स्वरूप सम्पूर्ण जगत् आपसे ही उत्पन्न होता है तथा आप में ही स्थित है और आप में ही लीन होता है ।

          ( इस प्रकार श्रीशंकराचार्य रचित वेदसारशिवस्तोत्र समाप्त ।)

Sunday, 12 February 2017

यशोदाजी के मायके से जब पंडित आये?

श्रीयशोदाजी के मायके से एक ब्राह्मण गोकुल आये।नंदरायजी के घर बालक का जन्म हुआ है,यह सुनकर आशीर्वाद देने आये थे।मायके से आये ब्राह्मण को देखकर यशोदाजी को बड़ा अानंद हुआ।पंडितजी के चरण धोकर , आदर सहित उनको घर में बिठायाऔर उनके भोजन के लिये योग्य स्थान गोबर से लिपवा दिया।पंडितजी से बोली ,देव आपकी जो इच्छा हो भोजन बना लें।यह सुनकर विप्र का मन अत्यन्त हर्षित हुआ।विप्र ने कहा बहुत अवस्था बीत जाने पर विधाता अनुकूल हुए, यशोदाजी! तुम धन्य हो जो ऐसा सुन्दर बालक का जन्म तुम्हारे घर हुआ।

    यशोदाजी गाय दुहवाकर दूध ले आईं ,ब्राह्मण ने बड़ी प्रसन्नता से घी मिश्री मिलाकर खीर बनायी।खीर परोसकर वो भगवान हरी को भोग लगाने के लिये ध्यान करने लगे।जैसे ही आँखे खोली तो विप्र देव ने देखा कन्हाई खीर का भोग लगा रहे हैं।वे बोले यशोदाजी! आकर अपने पुत्र की करतूत तो देखो, इसने सारा भोजन जूठा कर दिया।ब्रजरानी दोनो हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगी ,विप्रदेव बालक को क्षमा करें और कृपया फिर से भोजन बना लें।व्रजरानी दुबारा दूध घी मिश्री तथा चावल ले आयीं और कन्हाई को घर के भीतर ले गयीं ताकि वो कोई गलती न करें।विप्र अब पुन: खीर बनाकर अपने अराध्य को अर्पित कर ध्यान करने लगे, कन्हाई फिर वहाँ आकर खीर का भोग लगाने लगे।विप्रदेव परेशान हो गये।मैया मोहन को गुस्से से कहती हैं -  कान्हा लड़कपन क्यों करते हो?तुमने ब्राह्मण को बार-बार खिजाया( तंग) है। इस तरह बिप्रदेव जब-जब भोग लगाते हैं , कन्हाई आकर तभी जूठा कर देते हैं।अब माता परेशान होकर कहने लगी ' कन्हाई मैंने बड़ी उमंग से ब्राह्मणदेव को न्योता दिया था और तू उन्हें चिढ़ाता है?जब वो अपने ठाकुरजी को भोग लगाते हैं, तब तू यों ही भागकर चला जाता है और भोग जूठा कर देता है' । यह सुनकर कन्हाई बोले---- मैया तू मुझे क्यों दोष देती है,विप्रदेव स्वयं ही विधि विधान से मेरा ध्यान कर हाथ जोड़कर मुझे भोग लगाने के लिये बुलाते हैं,हरी आओ , भोग स्वीकार करो।मैं कैसे न जाऊँ।

           ब्राह्मण की समझ में बात आ गयी ।अब वे ब्याकुल होकर कहने लगे , प्रभो ! अज्ञानवश मैंने जो अपराध किया है , मुझे क्षमा करें।यह गोकुल धन्य है ,श्रीनन्दजी और यशोदाजी धन्य हैं , जिनके यहाँ साक्षात् श्रीहरि ने अवतार लिया है।मेरे समस्त पुन्यों एवं उत्तम कर्मों का फल आज मुझे मिल गया , जो दीनबन्धु प्रभु ने मुझे साक्षात दर्शन दिया।सूरदासजी कहते हैं कि विप्रदेव बार बार हे अन्तर्यामी ! हे दयासागर !मुझपर कृपा कीजिये, भवसे पार कीजिये ,और यशोदाजी के आँगन मे लोटने लगे।


Tuesday, 10 January 2017

कान्हा ने जब गोपियों की शिकायत की यशोदा मैया से।

मैया जब मैं घर से चलूँ , बुलावें ग्वालिन सादर मोय ।
अचक हाथ को झालो देके,  मीठी बोले देवर कहके ।
निधरक हो जायँ साँकर देके , झपट उतारे  काछनी ,
मुरली लेयँ  छिनाय  ।  मैं बालक ये धींगरी ,
इनसे  कहा   बसाय । खुद  नाचे  अरू मोयँ  नचावें ।
क्या - क्या बताऊँ तोको मोरी मैया ।मैया जब ...... ।। १ ।।

एक दिना एक चतुर बहुरिया, ले गई मेरी पकड़ अँगुरिया ।
छोटी सी उसकी राम कुठरिया, गोरस की मटकी तभी ,
धरी  पास  तत्काल । माखन दूँगी  घनों सो ,चैंटी बीनो लाल।
मैंने बाकी चैंटी बीनी । वह गई निधरक सोय ।।मैया जब ... ।।२ ।।

एक दिना की सुन मोरी मैया, मैं बैठो हो कदम की छैंया ।
ढिग बैठो बलदाऊ भैया ,एक आई जल भरन को ,
फिसल गयो वाको पाँव ।मेरे गोहन पड़ गई और बोली , 
धक्का दीनों श्याम , दे दे गुलचा गाल लाल किये ।
मैं ठाड़ो रह्यो रोय ,मोरी मैया।मैया जब ........ ।। ३ ।।

तेरे मुँह पर करें बड़ाई , पाछे  वो तेरी करें बुराई ।
ऐसी ब्रज की ढीठ लुगाई , इनकी तु पतियाती ।
और मुझे झूठा बनाती , इनको समझती शाह।
चोर नाम मेंरो धरो , होन न देंगी मेरो ब्याह  ।
मेरे साथ ये ऐसों करती , जैसो करें न कोय । मैया जब ..   ।। ४ ।।





Sunday, 13 November 2016

ShriNandKumarashtakam ( श्रीनंदकुमाराष्टकम् )

      


सुंदर गोपालं उरवनमालं नयन विशालं दु:ख हरम् ,
वृंदावनचंद्रम् आनंदकन्दम् परमानंदम् धरणीधरम् ।
वल्लभ घनश्यामं पूर्णकामं अत्यभिरामं प्रीतिकरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व विचारं ब्रह्मपरम् ।।१ ।।

सुंदर वारिजवदनं निर्जित मदनं आनंद सदनं मुकुटधरम् ,
गुंजाकृतिहारं  विपिनविहारं  परमोदारं  चीरहरम्  ।
वलल्भ पटपीतं कृत उपवीतं कर नवनीतं विबुधवरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व विचारं  ब्रह्मपरम्  ।। २ ।।

शोभित सुखमूलं यमुनाकूलं निपट अतूलं सुखद वरम् ,
मुख मण्डित रेणुं चारित धेनुं वादित वेणुं मधुर सूरम् ।
वल्लभ मति विमलं शुभपद कमलं नखरुचि विमलं तिमिर हरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं  ब्रह्मपरम्  ।। ३ ।।

शिर मुकुट सुदेशं  कुंचित केशं नटवर वेषं कामवरम् ,
मायाकृत मनुजं हलधर अनुजं प्रतिहतदनुजं भारहरम् ।
वल्लभव्रजपालं सुभगसुचालं हितमनुकालं भाववरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व विचारं  ब्रह्मपरम्  ।। ४ ।।

इन्दीवरभासं प्रकट सुरासं कुसुम विकासं वंशीधरम् ,
जित मन्मथ मानं रूप निधानं कृतकलगानं चित्तहरम् ।
वल्लभ मृदु हासं कुंज निवासं विविध विलासं ब्रह्मपरम् ।। ५ ।।

अति परम प्रवीणं पालितदीनं भक्ताधीनं कर्म करम् ,
मोहनमति धीरं कलिबलिवारं हत परवीरं तरल तरम् ।
वल्लभ व्रज रमणं वारिज वदनं जलधर शमनं शैलधरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं ब्रह्मपरम्  ।। ६ ।।

जलधर द्युतिकायं ललितत्रिभंगं बहु कृतिरंगं रसिकवरम् ,
गोकुल  परिवारं  मदनाकारं  कुंज  विहारं  गूढ़नरम् ।
वल्लभ व्रजचंद्रम् सुभग सुछंदम् परमानंदम भ्रांतिहरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं  ब्रह्मपरम ।। ७ ।।

वंदित युग चरणं पावनकरणं जगदुद्धरणं विमलधरं ,
कालिय शिर गमनं कृतफणि नमनं घातितयमनं मृदुल तरम् ।
वल्लभदु:खहरणं  निर्मलचरणं  अशरणशरणं  मुक्तिकरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं ब्रह्मपरम्   ।। ८ ।।

।। इति श्रीमद् वल्लभाचार्य विरचितं नंदकुमाराष्टकं सम्पूर्णम्  ।।

Thursday, 3 November 2016

ShriDamodarashtkam ( श्रीदामोदराष्टकम् )



नमामीश्वरं  सच्चिदानंदरूपं
लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम्  ।
यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं
परामृष्टमत्यं ततो द्रुत्य गोप्या  ।।१ ।।

( जिनके कपोलों पर लटकते मकराकृत-कुंडल क्रीड़ा कर रहे हैं, जो गोकुल के चिन्मय धाम में परम शोभायमान हैं, जो दूध की हांडी फोड़ने के कारण माँ यशोदा से भयभीत होकर ऊखल के उपर से कूदकर अत्यन्त वेग से दौड़ रहे हैं और जिन्हें माँ यशोदा ने उनसे भी अधिक वेग से दौड़कर पकड़ लिया है, ऐसे सच्चिदानंद- स्वरूप सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूँ।)

रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तं
कराम्भोज-युग्मेन सातंकनेत्रं ।
मुहु:श्वास कम्प - त्रिरेखांक - कण्ठ
स्थित ग्रैव - दामोदरं भक्तिबद्धम् ।। २  ।।

( जननी के हाथ में लाठी को देखकर मार खाने के भय से जो रोते-रोते बारंबार अपनी दोनों आँखों को अपने हस्तकमल से मसल रहे हैं, जिनके दोनों नेत्र भय से अत्यन्त विह्वल हैं, रूदन के कारण बारंबार साँस लेने के कारण तीन रेखाओं से युक्त शंख रूपी जिनके कंठ में पड़ी मोतियों की माला काँप रही है, और जिनका उदर ( माँ यशोदा की वात्सल्य भक्ति द्वारा ) रस्सी से बँधा हुआ है, उन सच्चिदानन्द - स्वरूप सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ )

इतिदृक् स्वलीलाभिरानंद कुण्डे
स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम् ।
तदीयेशितज्ञेषु  भक्तैर्जितत्वं
पुन:  प्रेमतस्तं  शतावृत्ति  वन्दे  ।। ३ ।।

( जो इस प्रकार की बाल्य- लीलाओं द्वारा गोकुलवासियों को आनन्द सरोवर में नित्यकाल सराबोर करते रहते हैं,और जो ऐश्वर्यपूर्ण ज्ञानी भक्तों के समक्ष यह उजागर करते हैं कि " मैं केवल ऐश्वर्यविहीन प्रेम और भक्ति द्वारा ही जीता जा सकता हूँ," उन दामोदर श्रीकृष्ण की मैं प्रेमपूर्वक बारम्बार वंदना करता हूँ।)

वरं देव ! मोक्षं न मोक्षावधिं वा
न चान्यं वृणेअहं वरेशादपीह  ।
इदं  ते  वपुर्नाथ  गोपाल  बालं
सदा मे मनस्याविरस्तां  किमन्यै: ।।४ ।।

( हे देव ! आप सब प्रकार से वर देने में पूर्ण सक्षम हैं, तो भी मैं आप से मोक्ष या मोक्ष की चरम सीमारूप वैकुण्ठ आदि लोक भी नहीं चाहता और न ही अन्य कोई ( नवधा भक्ति द्वारा प्राप्त किये जाने वाले ) वरदान चाहता हूँ। हे नाथ ! मैं तो केवल एक ही वर चाहता हूँ कि आपका यह बालगोपाल रूप मेरे हृदय में सदा - सदा के लिये विराजमान रहे।मुझे अन्य दूसरे वरदानों से कोई प्रयोजन नहीं है।)



इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलै-
र्वृतं कुन्तलै: स्निग्ध- रक्तैश्च गोप्या ।
मुहुश्चुम्बितं  बिम्बरक्ताधरं मे 
मनस्याविरस्तामलं लक्षलाभै: ।।५ ।।

( हे देव ! कुछ - कुछ लालिमा लिये हुये कोमल तथा घुँघराले बालों से घिरा आपका मुखकमल माँ यशोदा द्वारा बारम्बार चुम्बित है और आपके होंठ बिम्ब फल के समान लाल हैं। आपका यह मधुर रूप नित्यकाल तक मेरे हृदय में प्रकट होता रहे।मुझे लाखों प्रकार के अन्य लाभों की आवश्यकता नहीं है।)

नमो देव दामोदरानन्त विष्णो 
प्रसीद प्रभो दु:ख जलाब्धि- मग्नम् ।
कृपादृष्टि- वृष्टियातिदीनं बतानु
गृहाणेश   मामज्ञमेध्यक्षि दृश्य: ।।६ ।।

( हे परमदेव ! हे दामोदर ! हे अनन्त ! हे विष्णो ! हे प्रभो ! हे भगवन !  मुझपर प्रसन्न होवें । मैं दु:खों के समुद्र में डूबा जा रहा हूँ।अतएव आप अपनी कृपादृष्टि रूपी अमृतवर्षा कर मुझ दीन - हीन शरणागत पर अनुग्रह कीजिये एवं मेरे नेत्रों के समक्ष साक्षात् दर्शन दीजिये।) 

कुबेरात्मजौ बद्धमूर्त्यैव यद्वत्
त्वयामोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च ।
तथा  प्रेमभक्तिं  स्वकां  मे  प्रयच्छ 
न  मोक्षे  गृहो मेअस्ति  दामोदरेह ।। ७ ।।

( हे दामोदर ! जिस प्रकार आपने दामोदर रूप से ऊखल में बँधे रहकर भी नलकूबर और मणिग्रीव नामक कुबेर के दोनों पुत्रों को नारदमुनि के शाप से मुक्त करके अपनी भक्ति प्रदान की थी, उसी प्रकार मुझे भी आप अपनी प्रेमभक्ति प्रदान कीजिये।यही मेरा एकमात्र आग्रह है।किसी अन्य प्रकार के मोक्ष की मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है।)

नमस्तेअस्तु दाम्ने स्फुरद्धीप्तिधाम्ने
त्वदीयोदरायाथ  विश्वस्य  धाम्ने  ।
नमो राधिकायै त्वदीय - प्रियायै
नमोअनंत  लीलाय देवाय तुभ्यम् ।। ८ ।।

( हे दामोदर ! आपके उदर को बाँधने वाली महान् रस्सी को प्रणाम है, निखिल ब्रह्मतेज के आश्रय और सम्पूर्ण विश्व के आधारस्वरूप आपके उदर को नमस्कार है।आपकी प्रियतमा श्री राधारानी के चरणों में मेरा बारम्बार प्रणाम है और हे अनन्त लीलाविलास करने वाले भगवन् ! मैं आपको भी सैकड़ों प्रणाम अर्पित करता हूँ।








Wednesday, 12 October 2016

व्रज भूमि के गिरिराज पर्वत ( गोवर्धन ) की कथा।

गोवर्धन पर्वत अपना सर्वस्व श्रीकृष्ण को ही मानते हैं।यह पर्वत अपने पत्र ,पुष्प ,फल ,और जल को श्रीकृष्ण का ही मानकर उन्हें सदा समर्पित करता है।जब प्रभु तथा उनके सखाओं को भूख लगती है,तो नाना प्रकार के फल उन्हें अर्पित करता है,और प्यास लगने पर अपने मधुर जल से उन्हें तृप्त करता है।प्रभु को सजाने के लिये तरह-तरह के पुष्प गले के हार के लिये अर्पित करता है।

            पौराणिक कथानुसार गिरिराज द्रोणपर्वत का पुत्र है।एक बार ऋषि पुलस्त्य ने द्रोणपर्वत से उनके पुत्र गोवर्धन को अपने साथ अन्यत्र ले जाने के लिये विनय किया।तब गोवर्धनपर्वत ने शर्त रखी कि यदि मार्ग में थकान या किसी कारण वश कहीं भी भूमि पर उन्हें रखा गया तो गोवर्धन वहीं अटल हो जायेंगे।

          ऋषि पुलस्त्य जब व्रजभूमि के ऊपर से गुजर रहे थे तो गिरिराज ने अपना वजन इतना बढ़ा लिया कि पुलस्त्य ऋषि को
गिरिराजपर्वत भूमि पर रखना पड़ा।वह भूमि व्रजभूमि ही थी, और गिरिराज श्रीकृष्ण की पावन स्थली वृन्दावनधाम में सदा-सदा के लिये विराजमान हो गया।ऋषि पुलस्त्य को इस बात पर बड़ा क्रोध आया,और उन्होने गिरिराज को शाप दे दिया कि तू दिन प्रतिदिन तिल-तिल घटता जायगा, और यह क्रम आज भी चल रहा है।

         वाराहपुराण के एक कथानुसार------त्रेता युग में जब प्रभु श्रीराम को समुद्र पर पुल का निर्माण हेतु बड़े-बड़े पाषाण-खण्ड एवं पर्वतों की आवश्यकता हुई, तब हनुमानजी बहुत सारे पाषाणखण्ड उठा कर लाये।उसी समय गिरिराज को भी उठाकर पवनपुत्र ला रहे थे, कि तभी घोषणा हुई कि सेतुबन्ध का कार्य पूर्ण हो चुका है।अब पाषाणखण्ड की कोई आवश्यकता नहीं है।विवश होकर हनुमानजी ने लौटकर पर्वतराज को अपने पूर्व स्थान पर ही स्थापित कर दिया।उस समय गिरिराज को महान क्षोभ हुआ कि मैं प्रभु श्रीराम के कोई काम न आ सका।तब प्रभु उसके अन्तस के क्षोभ का आभास पाते हुये आश्वस्त किया कि द्वापर युग में मेरे कृष्णावतार के समय तुम्हें मेरे चरणरजस्पर्श एवं लीलावलोकन का पूर्ण लाभ मिलेगा।तुम श्रीकृष्ण के परम प्रिय हरिदासवर्य बनोगे।इन्द्रकोप के समय श्रीकृष्ण अपने नख पर धारण कर समस्त ब्रजमंडल की रक्षा का माध्यम तुम्हें ही बनायेंगे।गिरिराज को हरिदासवर्य कहा गया है,अर्थात भगवद्भक्तों में परम श्रेष्ठ हैं।इस पर्वत पर श्रीकृष्ण गोचारण करते हुये अपने चरणों का उन्हें स्पर्ष कराते हैं ,धन्य हैं ये गिरिराज, और धन्य है इनकी कथा।भगवान श्रीकृष्ण ने तो स्वयं गिरिराज बनकर अन्नकूट का भोग स्वीकार किया।यह गिरिराज तो कृष्ण व्रजराज कहलाए।कृष्ण गोपाल तो यह गोवर्धन।गिरिराज के बिना ब्रज की कल्पना नहीं की जा सकती।

Saturday, 24 September 2016

Ki Jane Kaun Se Gun Par ,DayaNinidhi Reejh Jate Hai.( कि जाने कौन से गुण पर,दयानिधि रीझ जाते हैं।)


कि जाने कौन से गुण पर, दयानिधि रीझ जाते हैं।
यही सद् ग्रंथ कहते  हैं, यही हरि भक्त गाते हैं  ।
कि जाने कौन-------- ---------------------।

नहीं स्वीकार करते हैं, निमंत्रण नृप दुर्योधन का।
विदुर के घर पहुँचकर, भोग छिलकों का लगाते हैं।
कि जाने कौन से ------------------------------।

न आये मधुपुरी से गोपियों की, दु: ख कथा सुनकर।
द्रुपदजा की दशा पर,  द्वारका से दौड़े  आते हैं  ।
कि जाने कौन से------------------------------- 

न रोये बन गमन में , श्री पिता की वेदनाओं पर ।
उठा कर गीध को निज गोद में , आँसु बहाते हैं ।
कि जाने कौन से------------------------------ ।

कठिनता से चरण धोकर , मिले कुछ 'बिन्दु' विधि हर को
वो चरणोदक स्वयं केवट के , घर जाकर लुटाते हैं।
कि जाने कौन से------------------------------------- ।