Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Thursday, 13 April 2017

Ma Durga Ke Pratham Swaroop 'Shailputri Mata ' Ki Puja

नवरात्र के प्रथम दिन घट स्थापन के बाद माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप 'माता शैलपुत्री' की पूजा करने का विधान है।शैल का अर्थ है हिमालय और हिमालय के यहाँ जन्म लेने के कारन इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है।पार्वती के रूप में इन्हें भगवान शंकर की पत्नी के रूप में भी जाना जाता है।इनका वाहन वृषभ ( बैल ) होने के कारण इन्हें वृषभारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है।इनके दाएँ हाथ में त्रिशूल है और बाएँ हाथ में इन्होंने कमल धारण किया हुआ है।
          शास्त्रों में इनसे जुड़ी एक कहानी का उल्लेख है कि प्राचीन काल में जब सतीजी के पिता प्रजापति दक्ष यज्ञ कर रहे थे तो इन्होंने सभी देवताओं को इस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये आमंत्रित किया लेकिन अपने जमाता, भगवान भोले शंकर और अपनी पुत्री सती को निमन्त्रण नहीं भेजा।सतीजी को अपने पिता के यज्ञ में जाने की तीब्र इच्छा थी।उनकी व्यग्रता देखकर महादेव ने कहा, सम्भवत: प्रजापति दक्ष हमसे रूष्ट हैं, इसलिये उन्होंने हमें आमंत्रित नहीं किया होगा।शंकरजी के इस वचन से सतीजी सन्तुष्ट नहीं हुई,और जाने की जिद करने लगीं।उनकी वेचैनी देखकर महादेव ने उन्हें जाने की अनुमति दे दिया।
                  सतीजी जब अपने पिता के घर पहुँची तो सिर्फ माँ ने ही उन्हें स्नेह दिया तथा पुत्री को देखकर प्रसन्न हुई।घर के अन्य सदस्य ने ना तो ठीक से उनसे बातचीत किया और ना ही उनका हाल समाचार पूछा,बल्कि महादेव के उपर व्यंगात्मक छीटाकशी भी की।पिता दक्ष ने भी महादेव के  प्रति व्यंगात्मक कुछ बाते कहीं जो सतीजी को उचित नहीं लगा । अपने पति का तिरस्कार होता देख उन्होंने योगाग्नि से अपने आप को भस्म कर लिया।जब भगवान शंकर को सती के भस्म होने के विषय में पता चला तो वे अत्यधिक क्रोधित हो गये और उन्होंने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करवा दिया।यही सतीजी अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाई।शैलपुत्री का विवाह भगवान शंकर से हुआऔर वो भगवान शंकर की पत्नी बन गईं।ऐसा कहा जाता है कि माँ दुर्गा के इस शैलपुत्री स्वरूप का पूजन करने से उपासक की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती है और कन्याओं को मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है।इनकी पूजा में लाल फूल,सिन्दूर नारियल और घी के दीपक का प्योग होता है।माँ शैलपुत्री का पूजन और स्तवन निम्न मंत्र से किया जाता है।

                         ' वन्दे वांछितलाभाय , चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
                           वृषारूढ़ां शूलधरां,   शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ।।'
   अर्थात् मैं मनोवांछित लाभ के लिये अपने मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाली , वृष पर सवार रहने वाली , शूलधारिणी और यशस्विनी माँ शैलपुत्री की वंदना करता हूँ।

Tuesday, 11 April 2017

Mai Ram Nam Gun Gaun मैं राम नाम गुण गाऊँ

मैं   राम  नाम  गुण  गाऊँ ,भगवन राम नाम गुण गाऊँ ।
तेरा  सहारा   लेकर  भगवन  भवसागर  तर   जाऊँ  ।।

विपदा  के  मारों  का  तू  है , जनम - जनम  का  साथी ,
तेरे  ही  नाम  से  रौशन  दुनिया  की  अँधियारी  वाती  ।
मन  मन्दिर  में  निशदिन  भगवन  प्रेम  की  जोत  जलाऊँ ।
मैं  राम  नाम  गुण  गाऊँ------------ ।

कहते  हैं  कण - कण में  प्रभुजी  तेरा  रूप  समाया  ,
फिर भी मैं भगवन देख  न  पाऊँ , क्या  ये  तेरी  माया ।
मुझको  दान  करो  वह अँखियाँ , जिनसे  मैं  दर्शन पाऊँ 
मैं  राम  नाम  गुण  गाऊँ ------------।

Sunday, 2 April 2017

माँ दुर्गा का सातवां रूप ' माँ कालरात्रि'

नवरात्र के सातवें दिन दुर्गाजी के सातवें स्वरूप माँ कालरात्रि की पूजा होती है।इनका वर्ण अंधकार रात्रि की तरह काला है ।बाल बिखरे हुये हैं और गले में माला बिजली की तरह देदीप्यमान है।इन्हें तमाम आसुरि शक्तियों का विनाश करने वाला बताया गया है।इनके तीन नेत्र और चार हाथ हैं ।इनके एक हाथ में खड़ग है तो दूसरे हाथ में लौह अस्त्र है, तीसरे हाथ मेंअभयमुद्रा है और चौथे हाथ में वरमुद्रा है।इनका वाहन गर्दभ अर्थात गधा है।कालरात्रि नाम के अनुरूप ,एैसी मान्यता है कि माँ अपने भक्तों की रक्षा काल से भी करती हैं अर्थात उनकी अकाल मृत्यु नहीं होती।इन्हें सभी सिद्धियों की देवी भी कहा जाता है।इसलिये तंत्र-मंत्र की उपासना करने वाले इसदिन इनकी विशेष रूप से पूजा करते हैं।इनके नाम के उच्चारण मात्र से ही सभी भूत,प्रेत,राक्षस,दानव और सभी पैशाचिक शक्तियाँ भाग जाती हैं।इनकी पूजा में गुड़ के भोग का विशेष महत्व है।माँ कालरात्रि की पूजा,अर्चना निम्न मंत्र से किया जाता है------ 

               एकवेणी जपाकर्ण, पूरा नग्ना खरास्थिता ।
                लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी, तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।
               वामपादोल्लसल्लोह, लताकंटकभूषणा ।
                वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा , कालरात्रिभयंकरी ।।

 अर्थात एक वेणी ( बालों की चोटी ) वाली, जपाकुसुम ( अड़हुल ) के फूल की तरह लाल कर्ण वाली, उपासक की कामनाओं को पूर्ण करने वाली,गर्दभ पर सवारी करने वाली,लंबे होठों वाली, कर्णिका के फूलों की भांति कानों से युक्त,तैलीय त्वचा वाली, अपने बांये पैर में चमकने वाली लौह लता धारण करने वाली,कांटों की तरह आभूषण पहनने वाली, बड़े ध्वज वाली और भयंकर लगने वाली कालरात्रि माँ हमारी रक्षा करें।

Saturday, 1 April 2017

Ma Durga ka Chhatha Roop 'Ma Katyayani'माँ दुर्गा का छठा रूप ' माँ कात्यायनी'

नवरात्र के छठे दिन दुर्गाजी के छठे स्वरूप माँ कात्यायनी की पूजा और अर्चना की जाती है।ऐसा विश्वास है कि इनकी उपासना करने से अर्थ , धर्म , काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।माँ ने कात्य गोत्र के महर्षि कात्यायन के यहाँ पुत्री रूप में जन्म लिया,इसलिए इनका नाम कात्यायनी पड़ा।इनका रंग स्वर्ण की भांति अत्यन्त चमकीला है और इनकी चार भुजायें हैं।
               इनकी दाईं ओर के ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में है और नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में।बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में खड़ग अर्थात तलवार है और नीचे वाले हाथ में कमल का फूल है।इनका वाहन भी सिंह है।
     शास्त्रों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि महर्षि कात्यायन ने सर्वगुण संपन्न पुत्री पाने के उद्देश्य से भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या की और इन्हें पुत्री के रूप में कात्यायनी की प्राप्ति हुई।क्योंकि ये ब्रजभूमि की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं, संभवत: इसलिए ब्रज प्रदेश की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिये यमुना तट पर इन्हीं माँ कात्यायनी की पूजा की थी।
     इनके पूजन में शहद का विशेष महत्व बताया गया है।इसलिय इन्हें मधु का भोग लगाया जाता है।इनके उपासक को किसी प्रकार का कोई भय नहीं रहता है और वह सब तरह के पापों से मुक्त हो जाता है।इन्हें शोध की देवी कहा जाता है।उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों को इनकी पूजा अवश्य करनी चाहिये।इनकी पूजा अर्चना तथा स्तवन निम्न मन्त्र से किया जाता है।

                   चन्द्रहासोज्जवलकरा , शार्दूलवरवाहना ।
                    कात्यायनी शुभं दद्यात् , देवी दानवघातनी।।
अर्थात् चन्द्रहास की भाँति देदीप्यमान , शार्दूल अर्थात शेर पर सवार और दानवों का विनाश करने वाली माँ कात्यायनी हम सबके लिये शुभदायी हों।
              

Friday, 31 March 2017

'SkandMata'Ma Durga Ka Pancham Roop



नवरात्र के पाँचवे दिन दुर्गाजी के पाँचवे स्वरूप माँ स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है।स्कंद शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय (षडानन,अर्थात छह मुख वाले) का एक नाम है।स्कंद की माँ होने के कारण ही इनका नाम स्कंदमाता पड़ा।

               माना जाता है कि माँ दुर्गा का यह रूप अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करता है और उन्हें मोक्ष का मार्ग दिखाता है।माँ के इस रूप की चार भुजायें हैं।इन्होंने अपनी दाएँ तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद अर्थात् कार्तिकेयजी को पकड़ा हुआ है।इसी तरफ वाली निचली भुजा में कमल का पुष्प है।बाई ओर की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा है और नीचे दूसरे हाथ में श्वेत कमल का फूल है।सिंह इनका वाहन है।यह सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं।इसलिये इनके चारो ओर सूर्य सदृश अलौकिक तेजोमय मंडल सा दिखाई देता है।इन्हें कमल के आसन पर स्थित होने के कारण पद्मासना भी कहा जाता है।इनकी पूजा करने से भगवान कार्तिकेय, जो इनके पुत्र रूप मे इनकी गोद में विराजमान हैं, की भी पूजा स्वभाविक रूप से हो जाती है।मन की एकाग्रता के लिये भी देवी की कृपा विशेष रूप से फलदायी है।इनकी अराधना निम्न मंत्र से करनी चाहिये।

               सिंहासनगता  नित्यं,
                पद्माश्रितकरद्वया। 
               शुभदास्तु सदा देवी ,
                स्कंदमाता  यशस्विनी ।।

         अर्थात सिंह पर सवार रहने वाली और अपने दो हाथों में कमल का फूल धारण करने वाली यशस्विनी स्कंदमाता हमारे लिये शुभदायी हों।

Sunday, 26 March 2017

Vaishno Mata Ki Aarti


                            
                                   
            
 
भोर भई दिन चढ़ गया मेरी अम्बे , होने रही जय-जयकार 
मंदिर बिच आरती जय माँ, हे दरबारावाली आरती जय माँ ।

काहे की मैया तेरी आरती बनावाँ ,काहे दीपावाँ बीच बाती 
मंदिर बिच आरती जय माँ , सुहे चोलियाँवाली आरती जय माँ।

सर्व सोने दी तेरी आरती बनावाँ , अगर कपूर पावाँ बाती 
मंदिर बिच आरती जय माँ,जय माँ पिण्डीवाली आरती जय माँ।

कौन सुहागन दीवा वालिया मेरी मैया , कौन जागेगा सारी रात 
मंदिर बिच आरती जय माँ , सच्चियाँ जोतावाली आरती जय माँ।

सर्वसुहागन दीवा वालिया मेरी मैया, ज्योत जागेगी सारी रात
मंदिर बिच आरती जय माँ, जय माँ पहाड़ावाली आरती जय माँ ।

जुग-जुग जीवे तेरा जम्मुए द राजा , जिस तेरा भवन बनाया 
मंदिर बिच आरती जय माँ, जय माँ भवनावाली आरती जय माँ।

सिमर चरण तेरा ध्यानु यश गावे, चरणा ते जावाँ बलिहार 
मंदिर बिच आरती जय माँ ,जय माँ जोतावाली आरती जय माँ।


Friday, 24 March 2017

Aisa Pyar Baha De Maiya

 
 या देवी सर्वभूतेषू दया रूपेण संस्थिता ,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।
     दुर्गा दुर्गति दूर कर , मंगल कर सब काज ।
    मन मंदिर उज्जवल करो , कृपा कर के आज ।।

ऐसा प्यार बहा दे मैया , चरणों से लग जाऊँ मैं ।
सब अंधकार मिटा दे मैया , दर्श तेरा कर पाऊँ मैं ।ऐसा प्यार.....

जग में आकर जग को मैया , अब तक न पहचान सका ।
क्यों आया हूँ कहाँ है जाना , ये भी न मैं जान सका ।
तू है अगम अगोचर मैया , कहो कैसे लख पाऊँ मैं । ऐसा प्यार.....

कर कृपा जगदम्ब भवानी , मैं बालक नादान हूँ 
नहीं अराधन जप तप जानूँ , मैं अवगुण की खान हूँ ।
दे ऐसा बरदान हे मैया , सुमिरन तेरा गाऊँ मैं। ऐसा प्यार.....

मैं बालक तू मैया मेरी , निशदिन तेरी ओट है ।
तेरी कृपा ही में मेरी , भीतर जो भी खोट है ।
शरण लगा लो मुझको मैया , तुझपे बलि-बलि जाऊँ मैं ।ऐसा प्यार ...