Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Tuesday, 9 February 2016

Bhakt prahlad Ki Nyaypriya Katha. ( भक्त प्रह्लाद की न्यायप्रिय कथा ।)

प्रह्लाद पुत्र विरोचन , केशिनी नाम की एक अनुपम सुन्दरी कन्या के स्वयंवर में विवाह की इच्छा से पहुँचा।केशिनी सुधन्वा नाम के ब्राह्मण से विवाह करना चाहती थी।केशिनी ने विरोचन से पूछा -- विरोचन ! ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं या दैत्य ? यदि ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं , तो मैं ब्राह्मण पुत्र सुधन्वा से ही विवाह करना पसंद करूँगी ।विरोचन ने कहा , हम प्रजापति की श्रेष्ठ संतानें हैं, अत: हम सबसे उत्तम हैं । हमारे सामने देवता भी कुछ नहीं हैं तो , ब्राह्मण श्रेष्ठ कैसे हो सकते हैं।

           केशिनी ने कहा इसका निर्णय कौन करेगा? सुधन्वा ब्राह्मण जानता था कि ,दैत्य राज प्रह्लाद यहाँ के राजा हैं तथा धर्मनिष्ठ भी।अत: प्रह्लाद जी के पास जाने का प्रस्ताव सुधन्वा ने रखा।विरोचन को विश्वास था कि पिताजी तो निर्णय अपने पुत्र के पक्ष में ही देंगे।अत: विरोचन तथा सुधन्वा ने प्राणों की बाजी लगा लिया ।अब केशिनी सुधन्वा तथा विरोचन तीनों प्रह्लाद जी  की सभा में पहुँचे।

        प्रह्लाद ने अपने सेवकों से सुधन्वा ब्राह्मण के सत्कार के लिये जल तथा मधुपर्क मँगाया तथा बड़े ही भाव  से ब्राह्मण के चरण धुलवाकर आसन बैठने को दिया तथा पूछा कि आपने यहाँ आने का कष्ट कैसे किया? सुधन्वा ने कहा ! मैं तथा आपका पुत्र विरोचन प्राणों की बाजी लगाकर यहाँ अाये हैं , कि क्या ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अथवा विरोचन ?

                प्रह्लादजी यह सुनकर गंभीर हो गये।उन्होंने कहा , ब्रह्मण ! मेरे एक ही पुत्र है और इधर धर्म , मैं भला कैसे निर्णय दे सकता हूँ ? विरोचन ने कहा - राजन ! नीति जो कहती है , उसके आधार पर ही निर्णय कीजिये ।प्रह्लादजी ने अपने पुत्र से कहा-- विरोचन ! सुधन्वा के पिता  ऋृषि अंगिरा , मुझसे श्रेष्ठ हैं , इनकी माता , तुम्हारी माता से श्रेष्ठ हैं तथा सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ है । अत: तुम सुधन्वा से हार गये हो।सुधन्वा आज से तुम्हारे प्राणों का मालिक है।

              सुधन्वा बोला-- प्रह्लाद !तुमने स्वार्थवश असत्य नहीं कहा है। तुमने धर्म को स्वीकार करते हुये न्याय किया है , इसलिये  तुम्हारा पुत्र मैं तुम्हें लौटा रहा हूँ लेकिन केशिनी के समक्ष इसे मेंरा पैर धोना पड़ेगा।विरोचन समझ गया , और स्वेक्षा से सुधन्वा ब्राह्मण के पैर धोकर आशीर्वाद लिया।

Tuesday, 2 February 2016

Gwalbal sang Dhenu Charawat Krishna.


श्यामसुन्दर अपने सखा से गैया चराते हुये कहते हैं, ' सखा सुबल, श्रीदामा, तुमलोग सुनो ! वृन्दावन मुझे बहुत अच्छा लगता है, इसी कारण मैं व्रज से यहाँ वन में गायें चराने आता हूँ।कामधेनु, कल्पवृक्ष आदि जितने वैकुण्ठ के सुख हैं,देवि लक्ष्मी के साथ वैकुण्ठ के उन सब सुखों को मैं भूल जाता हूँ।इस वृन्दावन में यहाँ यमुना किनारे गायों को चराना मुझे अत्यन्त प्रिय लगता है।कन्हैया अपने श्रीमुख से कहते हैं --' सखा तुमलोग मेरे मन को अति प्रिय लगते हो।गोपबालक यह सुनकर चकित हो जाते हैं ,कि श्रीहरि अपनी लीला का यह रहस्य उन्हें प्रत्यक्ष बतला रहे हैं।

                      गोपसखा हाथ जोड़कर कहते हैं---- 'श्यामसुन्दर ! तुम हमें कभी मत भूलना। जहाँ - जहाँ भी तुम अवतार धारण करो, वहाँ - वहाँ हमसे अपने चरण छुड़ा मत लेना ( हमें भी साथ रखना ) ।' श्रीकृष्णचन्द्र बोले---- ' व्रज से तुमलोगों को कहीं पृथक नहीं हटाऊँगा, क्योंकि यहीं , तुम्हारा साथ पाकर मैं भी व्रज में आता हूँ।व्रज के इस अवतार में जो आनंद प्राप्त हो रहा है, यह आनंद चौदहों लोकों में कहीं नहीं है।' यह मोहन ने बतलाया तथा कुछ बालक लौटकर घर जा रहे थे , उनसे कहकर दोपहर का भोजन मँगाया तथा सब साथ हिलमिल कर भोजन का आनन्द लेने लगे।

                 सूरदासजी कहते हैं कि मेरे स्वामी कंधे पर काला कम्बल और हाथ में छड़ी लेकर वृन्दावन में गायें चराते हैं और 
 ' काली ' , ' गोरी ' , 'धौरी' , ' धूमरी ' , इस प्रकार नाम ले - लेकर उन्हें पुकारते हैं। जहाँ - तहाँ वन - वन में गोपबालक के साथ गायों को ढूँढते हैं ।समस्त लोकों का नाथ होने पर भी हाथ से अपना पीताम्बर उड़ाकर गायों को संकेत देकर बुला रहे हैं।

                        ' काँधे कान्ह कमरिया कारी , लकुट लिये कर घेरै हो  । 
                            बृन्दाबन में गाइ चरावै      , धौरी ,  धूमरी   टेरै     हो ।।
                         लै   लिवाइ ग्वालनि  बुलाइ कै ,  जहँ - तहँ बन - बन हेरै हो।
                         सूरदास प्रभु सकल लोकपति   ,   पीतांबर   कर  फेरै  हो  ।।'


Tuesday, 19 January 2016

Narad ji ki purv janam ki katha

 


नारदजी पूर्वजन्म में एक दासीपुत्र थे।उनकी माता भक्तों की जब सेवा करती थी, नारदजी भी उनके काम में सहायता करते थे।कभी- कभी माता की अनुपस्थिति में वे स्वयं भक्तों की सेवा करते रहते थे।नारदजी स्वयं कहते हैं ---

  उच्छिष्टलेपाननुमोदितो  द्विजै:
  सकृत्स्म  भुंजे  तदपास्तकिल्बिष: ।
   एवं  प्रवृत्तस्य   विशुद्धचेतस-
   स्तद्धर्म   एवात्मरुचि:  प्रजायते  ।।

श्रीमद्भागवतके इस श्लोक में ( १ . ५ . २५ ) नारदजी अपने शिष्य व्यासदेव से अपने पूर्वजन्म का वर्णन करते हैं ।वे कहते हैं कि पूर्वजन्म में बाल्यकाल में वे चातुर्मास में शुद्धभक्तों ( भागवतों ) ) की सेवा किया करते थे जिससे उन्हें उनकी संगति प्राप्त हुई।कभी-कभी वे ऋषि अपनी थालियों में उच्छिष्ट भोजन छोड़ देते और यह बालक थालियाँ धोते समय उच्छिष्ट भोजन को चखना चाहता था , अत: उसने उन ऋषियों से अनुमति माँगी और जब उन्होंने अनुमति दे दी तो बालक नारद उस उच्छिष्ट भोजन को खा लिया करते थे । फलस्वरूप वह बालक अपने समस्त पापकर्मों से मुक्त हो गये। ज्यों- ज्यों वह उच्छिष्ट खाता रहा त्यों - त्यों वह ऋषियों के समान शुद्ध- हृदय बनता गया। चूँकि वे महाभागवत भगवान् की भक्ति का आस्वाद श्रवण तथा कीर्तन द्वारा करते थे अत: नारदजी ने भी क्रमश: वैसी रुचि विकसित कर लिया। नारदजी आगे कहते हैं -----

               तत्रान्वहं    कृष्णकथा:  प्रगायताम्
                          अनुग्रहेणाशृणवं   मनोहरा: ।
               ता:   श्रद्धया  मेअनुपदं  विशृण्वत:
                 प्रियश्रवस्यंग   ममाभवद्  रुचि:  ।।

    ऋषियों की संगति करने से नारदजी में भी भगवान् की महिमा के श्रवण तथा कीर्तन की रुचि उत्पन्न हुई और उन्होंने भक्ति की तीब्र इच्छा विकसित की।अत: जैसा कि वेदान्तसूत्र में कहा गया है---- प्रकाशश्च  कर्मण्यभ्यासात्---- जो भगवद् भक्ति के कार्यों में केवल लगा रहता है उसे स्वत: सारी अनुभूति हो जाती है और वह सब समझने लगता है।इसी का नाम प्रत्यक्ष अनुभूति है।और यही  धर्म का परम लक्ष्य भक्ति की प्राप्ति है।
          
               

Thursday, 14 January 2016

Bhagwat Bhagwan Ki Hai Aarti ( भागवत् भगवान की है आरती )।



भागवत्  भगवान की है आरती ,
पापियों को पाप से है तारती ।---२ 

ये अमर ग्रंथ , ये मुक्ति पंथ ,
ये   पंचम  वेद   निराला ।
नव ज्योति जगाने वाला ,
हरि ज्ञान यही ,बरदान यही ,
जग के मंगल की आरती ,
पापियों को पाप से है तारती ।
भागवत् भगवान की है आरती ,
पापियों को पाप से है तारती।

ये शांतिगीत, पावन पुनीत,
शापों को मिटानेवाला ।
हरि दर्श  दिखाने वाला ,
है सुख करनी ,ये दु:खहरनी,
ये मधूसुदन की आरती।
पापियों को पाप से है तारती। 
भागवत् भगवान की है आरती,
पापियों को पाप से है तारती।

ये मधुर बोल, जग पंथ खोल,
सन्मार्ग दिखाने वाला ।
बिगड़ी को बनाने वाला,
श्रीराम यही, घनश्याम यही,
उनके महिमा की आरती ।
पापियों को पाप से है तारती।
भगवत् भगवान की है आरती,
पापियों को पाप से है तारती।

Monday, 11 January 2016

Papa paiyaan, chalein kanhaiya...!!



नंद भवन के आँगन में श्यामसुन्दर ,अपने छोटे- छोटे चरणों से चलना सीख रहे हैं।मैया यशोदा कान्हा की अँगुली पकड़कर साथ - साथ घूम रही हैं।कान्हा के चलने से ,उनके छोटे छोटे पैंजनी के रुनझुन बजने की आवाज यशोदा मैया को हर्षित कर रही है।मोहन के कानों के कुंडल तथा भौंहों तक सुन्दर घुँघराले बालों की लटें लटकती हुई अत्यन्त शोभा दे रही है।पृथ्वी पर ठुमक - ठुमक कर कन्हा अपना चरण रखते हैं कि कहीं गिर न जायें।कभी गिरते हैं तो तुरंत उठ खड़े हो जाते हैं।अब उन्हें चलना अच्छा लगने लगा है।घर से आँगन तक चलना अब कान्हा के लिए सुगम हो गया है, किन्तु देहली लाँघा नहीं जाताहै,  लाँघने में बड़ा परिश्रम होता है, बार - बार गिर पड़ते हैं।देहली लाँघते नहीं बन बनता।

कान्हा जब देहली पार करते समय बार बार गिरते हैं ,तो उनकी इस क्रीड़ा से देवताओं तथा मुनियों के मन में भी संदेह उत्पन्न होने लगता है कि यह कैसी लीला है प्रभु की ? जो करोड़ों ब्रह्मांण्डों का एक क्षण में निर्माण कर देते हैं और फिर उनको नष्ट करने में भी देर नहीं लगाते, उन्हें आँगन की देहली , माँ यशोदा हाथ पकड़ कर धीरे - धीरे पार कराती हैं।बलरामजी यह देखकर मन ही मन कहते हैं -- ' वामन अवतार में पूरी पृथ्वी तीन पग में नापने वाले प्रभु से , घर की देहली पार करना कठिन हो रहा है।सूरदासजी कहते हैं यह दृष्य देख - देख कर देवतागण तथा मुनि भी अपनी विचार शक्ति खोकर मुग्ध हो जाते हैं।

Tuesday, 29 December 2015

GovindDamodarStotram(गोविन्ददामोदरस्तोत्रम्।)



अग्रे कुरूणामथ पाण्डवानां
दु:शासने-नाहृत - वस्त्र -केशा।
कृष्णा  तदाक्रोशदनन्यनाथा
गोविन्द  दामोदर  माधवेति  ।।

(जब कौरव और पाण्डवों के सामने दु:शासन ने द्रौपदी के वस्त्र और बालों को पकड़ कर खींचा, तब अनन्य अनाथ द्रौपदी ने रोकर पुकारा -- 'हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव!--

श्रीकृष्ण  विष्णो  मधुकैटभारे
भक्तानुकम्पिन्  भगवन्  मुरारे ।
त्रायस्व  मां  केशव  लोकनाथा
गोविन्द  दामोदर  माधवेति    ।।

 (हे श्रीकृष्ण ! हे विष्णो ! हे मधुकैटभ को मारने वाले ! हे भक्तों के ऊपर अकारण अनुकम्पा करने वाले ! हे मुरारे ! हे केशव ! हे लोकेश्वर ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।)

ध्येय:  सदा  योगिभिरप्रमेय-
श्चिन्ताहरश्चिन्तिपारिजात: ।
कस्तूरिका - कल्पित - नीलवर्णो
  गोविन्द   दामोदर   माधवेति  ।।

( योगी भी जिन्हें ठीक - ठीक नहीं जान पाते , जो सभी प्रकार की चिन्ताओं को हरने वाले और मनोवांछित वस्तुओं को देने के लिये कल्पवृक्ष के समान हैं तथा जिनके शरीर का वर्ण कस्तूरी के समान नीला है, उन्हें सदा ही 'गोविन्द '! दामोदर ! माधव ! इन नामों से स्मरण करना चाहिये।

संसारकूपे   पतितोअत्यगाधे
मोहान्धपूर्णे   विषयाभितप्ते  ।
करावलम्बं  मम  देहि  विष्णो
गोविन्द  दामोदर   माधवेति  ।।

( जो मोहरूपी अंधकार से व्याप्त और विषयों की ज्वाला से संतप्त है , ऐसे अथाह संसार रूप कूप में मैं पड़ा हुआ हूँ। हे मधूसूदन !हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।)

त्वामेव  याचे  मम  देहि  जिह्वे
 समागते  दण्डधरे   कृतान्ते ।
वक्तव्यमेवं   मधुरं   सुभक्त्या
 गोविन्द  दामोदर   माधवेति  ।।

( हे जिह्वे ! मैं तुझी से एक भिक्षा मांगता हूँ , तूही मुझे दे ।वह यह कि जब दण्डपाणि यमराज इस शरीर का अंत करने आवें तो बड़े       ही प्रेम से गदगद् स्वर में ' हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !' इन मन्जुल नामों का उच्चारण करती रहना।)

भजस्व  मन्त्रं  भवबन्धमुक्त्यै 
जिह्वे  रसज्ञे  सुलभं  मनोज्ञम् ।
द्वैपायनाद्यैर्मुनिभि:    प्रजप्तं
गोविन्द   दामोदर    माधवेति ।।

 ( हे जिह्वे ! हे रसज्ञे ! संसाररूपी बंधन को काटने के लिये तू सर्वदा ' हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! ' इन नामरूपी मन्त्र का जप किया कर, जो सुलभ एवं सुन्दर है और जिसे व्यास , वसिष्ठादि  ऋषियों ने भी जपा है।)

गोपाल   वंशीधर   रूपसिन्धो
लोकेश   नारायण  दीनबन्धो ।
उच्चस्वरैस्त्वं   वद    सर्वदैव 
गोविन्द    दामोदर   माधवेति ।।

( रे जिह्वे ! तू निरन्तर ' गोपाल !  वंशीधर ! रूपसिन्धो ! लोकेश ! नारायण ! दीनबंधो ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' इन नामों का उच्च स्वर से कीर्तन किया करती रहना।

जिह्वे  सदैवं  भज  सुन्दराणि
नामानि  कृष्णस्य  मनोहराणि।
समस्त - भक्तार्ति  विनाशनानि
गोविन्द   दामोदर   माधवेति  ।।

( हे जिह्वे ! तू सदा ही श्रीकृष्णचन्द्र के ' गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' इन मनोहर मंजुल नामों को , जो भक्तों के संकटों की निवृत्ति करने वाले हैं, भजती रह।)

गोविन्द  गोविन्द  हरे  मुरारे
गोविन्द  गोविन्द  मुकुन्द  कृष्ण।
गोविन्द  गोविन्द   रथांड़्गपाणे
गोविन्द    दामोदर    माधवेति  ।।

 (हे जिह्वे ! ' गोविन्द ! गोविन्द ! हरे ! मुरारे ! गोविन्द ! गोविन्द ! मुकुन्द ! कृष्ण ! गोविन्द ! गोविन्द ! रथाड़्गपाणे ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव! ' इन नामों को तू सदा जपती रह ।)

सुखावसाने  त्विदमेव  सारं
दु:खावसाने  त्विदमेव  गेयम्।
देहावसाने  त्विदमेव  जाप्यं 
गोविन्द  दामोदर   माधवेति ।।

(सुख के अंत में यही सार है अर्थात् सभी सुख इसी नाम में समाहित हैं।दु:ख के अंत में यही गाने योग्य है और शरीर का अंत होने के समय भी ' हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! यही मन्त्र जपने योग्य है।)

दुर्वारवाक्यं  परिगृह्य  कृष्णा 
मृगीव  भीता  तु  कथं  कथंचित।
 सभां   प्रविष्टा   मनसाजुहाव 
गोविन्द    दामोदर   माधवेति  ।।

( दु:शासन के दुर्वचनों को स्वीकार कर मृगी के समान भयभीत हुई द्रौपदी किसी तरह सभा में प्रवेश कर स्वयं को अनाथ मानती हुई मन ही मन ' गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' इस प्रकार भगवान का स्मरण करने लगी ।)

श्रीकृष्ण   राधावर   गोकुलेश
गोपाल  गोवर्धन  नाथ  विष्णो । 
जिह्वे          पिबस्वामृतमेतदेव
 गोविन्द   दामोदर    माधवेति ।।

( हे जिह्वे ! तू ' श्रीकृष्ण ! राधारमण ! व्रजराज ! गोपाल ! गोवर्धन ! नाथ ! विष्णो ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ---इन नामामृत का निरन्तर पान करती रह।)

श्रीनाथ   विश्वेश्वर   विश्वमूर्ते
श्रीदेवकीनन्दन       दैत्यशत्रो  ।
जिह्वे       पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द   दामोदर     माधवेति ।।

( हे जिह्वे ! तू  ' श्रीनाथ ! सर्वेश्वर ! श्रीविष्णु स्वरूप देवकीनन्दन ! असुर निकन्दन ! गोविन्द ! दामोदर !  माधव ! इन नामामृत का निरन्तर पान करती रह। ) 

गोपीपते   कंसरिपो   मुकुन्द
लक्ष्मीपते   केशव    वासुदेव। 
जिह्वे            पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द   दामोदर    माधवेति    ।।

( हे जिह्वे ! तू ' गोपीपते ! कंसरिपो ( कंस का संहार करने वाले ) ! मुकुन्द ! लक्ष्मीपते ! केशव ! वासुदेव ! गोविन्द ! माधव ! ' --- इन नामामृत का निरंतर पान करती रह।) 

गोपीजनाह्लादकर          व्रजेश
गोचारणा- रण्य - कृत - प्रवेश ।
जिह्वे            पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर     माधवेति ।।

( व्रजराज, व्रजांगनाओं को आनन्दित करने वाले , जिन्होंने गौओं को चराने के लिये वन में प्रवेश किया, हे जिह्वे ! तू उन्हीं मुरारी के गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' --- इन नामामृत का निरन्तर पान कर। ) 

प्राणेश   विश्वम्भर   कैटभारे
वैकुण्ठ    नारायण    चक्रपाणे ।
जिह्वे          पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर     माधवेति।।

( हे जिह्वे ! तू ' प्राणेश ! विश्वम्भर ! कैटभारे ! वैकुण्ठ ! नारायण ! चक्रपाणे ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव !--- इन नामामृत का निरन्तर पान करती रह ।)

हरे   मुरारे     मधुसूदनाद्य
श्रीराम      सीतावर    रावणारे ।
जिह्वे           पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति ।।

( ' हे हरे ! हे मुरारे ! हे मधुसूदन ! हे पुराणपुरुषोत्तम ! हे रावणारे ! हे सीतापते श्रीराम ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! --- इन नामामृत का हे जिह्वे ! तू निरन्तर पान करती रह ।)' 

श्रीयादवेन्द्राद्रिधराम्बुजाक्ष
गोगोपगोपीसुखदानदक्ष। 
जिह्वे    पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द   दामोदर  माधवेति।।

( हे जिह्वे ! ' श्रीयदुकुलनाथ ! गिरिधर ! कमलनयन ! गो, गोप और गोपियों को सुख देने में कुशल श्रीगोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' इन नामामृत का निरन्तर पान करती रह ।) 

धरा- भरोत्तारण - गोप - वेश
विहारलीला - कृतबन्धुशेष   ।
जिह्वे            पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति  ।।

( जिन्होंने पृथ्वी का भार उतारने के लिये सुन्दर ग्वाला का रूप धारण किया है और आनन्दमयी लीला करने के निमित्त ही शेषजी (बलराम ) को अपना भाई बनाया है , ऐसे उन नटवर नागर के गोविन्द' ! दामोदर ! माधव ! ' - इस नामामृत का तू निरन्तर पान करती रह ।) 

बकी - बकाघासुर - धेनुकारे
केशी -  तृणावर्तविघातदक्ष  ।
जिह्वे       पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द   दामोदर   माधवेति ।।

( जो  पूतना , बकासुर ,अघासुर , और धेनुकासुर , आदि राक्षसों के शत्रु हैं और केशी तथा तृणावर्त  को पछाड़ने वाले हैं , हे जिह्वे!उन असुरारि मुरारि के 'गोविन्द ! दामोदर ! माधव !' -- इन नामामृत का तू निरन्तर पान करती रह ।) 

श्रीजानकीजीवन      रामचन्द्र
निशाचरारे          भरताग्रजेश।
 जिह्वे          पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द       दामोदर     माधवेति ।।

( ' हे जानकीजीवन भगवान राम ! हे दैत्यदलन भरताग्रज ! हे ईश ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! ' - इन नामामृत का हे जिह्वे ! तू निरन्तर पान करती रह।)

नारायणानन्त    हरे   नृसिंह
प्रह्लादबाधाहर    हे    कृपालो।
जिह्वे         पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति।।

(' हे प्रह्लाद की बाधा हरने वाले दयामय नृसिंह ! नारायण ! अनन्त ! हरे  ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! इन नामों का हे जिह्वे ! तू हमेशा पान करती रह।' )

लीला - मनुष्याकृति - रामरूप
प्रताप - दासी - कृत - सर्वभूप ।
जिह्वे            पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द    दामोदर      माधवेति ।।

(' हे जिह्वे ! जिन्होंने लीला ही से मनुष्यों की सी आकृति बनाकर रामरूप प्रकट किया है और अपने प्रबल पराक्रम से सभी भूपों को दास बना लिया है , तू उन नीलाम्बुज श्यामसुन्दर श्रीराम के ' गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! - इस नामामृत का ही निरन्तर पान करती रह ।' ) 

श्रीकृष्ण    गोविन्द   हरे   मुरारे
हे नाथ   नारायण     वासुदेव   ।
जिह्वे           पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति ।।

( ' हे जिह्वे ! तू ' श्रीकृष्ण ! गोविन्द ! हरे ! मुरारे ! हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव ! तथा गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! इन नामों का निरन्तर पान करती रह।' )

वक्तुंसमर्थोअपि न वक्ति कश्चि दहो
जाननां         व्यसनाभिमुख्यम्   ।
जिह्वे          पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति  ।।

(' अहो ! मनुष्यों की विषयलोलुपता कैसी आश्चर्यजनक है ! कोई - कोई तो बोलने में समर्थ होने पर भी भगवान नाम का उच्चारण  नहीं करते , किन्तु हे जिह्वे ! मैं तुमसे कहता हूँ , तू ' गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! इन नामों का प्रेमपूर्वक निरन्तर पान करती रह।')






Saturday, 26 December 2015

Maiya Mohi Daoo Bahut Khijayau.(मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायौ।) सूरदासजी के पद ।

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ ।
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ?
कहा करौं इहि रिस के मारैं , खेलन हौं नहिं जात ।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता , को है तेरौ तात  ।।
गोरे नंद  जसोदा  गोरी , तू कत स्यामल गात  ।
चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत , हँसत , सबै मुसुकात।।
तू मोही कौं मारन सीखी , दाउहि कबहुँ न खीझै ।
मोहन मुख रिस की ये बातैं , जसुमति सुनि-सुनि रीझै।।
सुनहु कान्ह , बलभद्र चबाई , जनमत ही कौ धूत ।
सूर स्याम मोहि गोधन की सौं , हौं माता तू पूत ।।

(श्यामसुन्दर कहते हैं------ )' मैया! दाऊ दादा ने मुझे बहुत चिढ़ायाहै। मुझसे कहते हैं---तू मोल लिया हुआ है, यशोदा मैया ने भला, तुझे कब जन्म दिया।' क्या करूँ, इसी क्रोध के मारे मैं खेलने नहीं जाता।वे बार-बार कहते हैं --तेरी माता कौन है? तेरे पिता कौन हैं? नन्दबाबा तो गोरे हैं, यशोदा मैया भी गोरी हैं, तू साँवले अंगवाला कैसे है?'चुटकी देकर ग्वाल-बाल मुझे नचाते हैं,फिर सब हँसते और मुस्कुराते हैं। मैया से कहते हैं-तूने तो मुझे ही मारना सीखा है, दाऊ दादा को कभी नहीं डाँटती।' सूरदासजी कहते हैं----मोहन के मुख से क्रोध भरी बातें बार-बार सुनकर यशोदाजी मन ही मन प्रसन्न हो रही हैं। वे कहती हैं--' कन्हाई ' ! सुनो, बलराम तो चुगलखोर है, वह जन्म से ही धूर्त है, श्यामसुन्दर मुझे गोधन ( गायों ) की शपथ, मैं तुम्हारी माता हूँ और तुम मेरे पुत्र हो।'