Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Saturday, 22 August 2015

He Deen Bandhu Dayalu guru(Guru vandana )गुरू वन्दना

       



हे दीन बन्धु दयालु गुरू, केहि भाँति तव गुण गाऊँ मैं ।
तुम्हरे पवित्र चरित्र केहि विधि , नाथ कहि के सुनाऊँ मैं।

जिह्वा अपावन है मेरी , गुरू नाम कैसे लीजिये ।
तन फँस रहा भव जाल में , गुरू ध्यान किस तरह कीजिये।

माता-पिता सुत भ्रात भार्या, कोई संग नहीं जायेंगे।
इस पाप कुंभी नर्क में, कोई न, हाथ   बटाएँगे।

यह सोंचकर तव शरण आया, अब ठिकाना है नहीं।
बस पार कर दो मेंरी नौका, और अपना है नहीं।
गुरू बन्दनम, गुरू बन्दनम, गुरू बन्दनम। 





(यह वन्दना प्रतिदिन मेंरे पिताजी ( स्वर्गीय चन्द्रशेखर प्रसाद ) द्वारा अपने गुरू को समर्पित की जाती थी।

Tuesday, 18 August 2015

Krishana Damodar Nam Rahasya katha (कृष्ण दामोदर नाम का रहस्य कथा)

दामोदर नाम का अर्थ है, दाम तथा उदर ।अर्थात दाम यानि रस्सी तथा उदर का अर्थ है पेट।पेट को रस्सी से बाँधना।कन्हैया को ओखल से मैया का बाँधना ।

एक दिन यशोदा माँ मन ही मन कान्हा का ध्यान करते हुए अपने हाथों से माखन मथानी से निकाल रही थी। कान्हा खेलते हुए अाते हैं और मैया की गोद में बैठकर दूध पीने लगते हैं।मैया भी प्यार से कान्हा के सिर पर अपना हाथ फेरती हुई दूध पिलाने लगती हैं।उसी समय पद्मगन्धा गाय का दूध जो चुल्हे पर यशोदा मैया ने चढ़ा रखा था, उफन कर गिरने लगता है। दूध को गिरता देख मैया कान्हा को गोद से उतार देती हैं और दूध की मटकी चुल्हे से उतारने चली जाती हैं।पद्मगन्धा गाय का दूध मैया कान्हा के लिए रखती हैं क्योंकि कान्हा को पसन्द है।परन्तु कान्हा को ये भी स्वीकार नहीं, कि मैया मुझे गोद से उतार कर कोई अन्य काम करें। कान्हा को क्रोध आ गया और उन्होंने दूध की मटकी को पत्थर मारकर तोड़ दिया और मैया से डरकर भाग खड़े हुए।मैया मटकी का दूध बहता देख परेशान हो गईं और उन्हें भी क्रोध आ गया। अब क्या था ,मैया हाथ में छड़ी लेकर कान्हा के पीछे-पीछे भागी।मैया ने कहा ,भागकर कहाँ जायेगा कान्हा , आज मैं तुझे सजा देकर रहूँगी।कान्हा तू बहुत बिगड़ गया है।आगे -आगे कान्हा पीछे-पीछे मैया,परन्तु कान्हा कहाँ हाथ आने वाले थे।थककर मैया हार मान गई, और हाथ से छड़ी फेंक दिया और उदास होकर बैठ गईं।यशोदा माँ ने ज्योंही हार माना, कान्हैया धीरे से आकर मैया के पास आकर खड़े हो गये और मैया को मनाने लगे।

मैया गोपियों के उलाहनें से भी दुखी थी , और आज तो कान्हा ने हद ही कर दिया था। मैया ने कान्हा का हाथ पकड़ा ,और कहने लगी, तू बड़ी मुश्किल से पकड़ में आया है।आज मैं तुझे सजा दूँगी, और रस्सी लाकर ओखल से कान्हा को बाँधने लगी । मैंया को यह करना अच्छा नहीं लग रहा था , इसलिये स्वयं भी रो रही थी।कान्हा के कमर में रस्सी डाली तो कन्हैया की कमर तथा ओखल के बीच दो अँगुल रस्सी छोटी पड़ गई।मैया की सारी कोशिष ,कान्हा को बाँधने की ब्यर्थ हो गई।मैया हार कर रस्सी रख कर बैठ गई , फिर क्या था, कान्हा स्वयं ओखल से बँध गये।इसलिये कान्हा का एक नाम दामोदर है ।सदगुरू ने कहा है जब मन वाणी और कर्म हरि के लिए समर्पित होता है,तो हरि स्वयं भक्त के यहाँ बँधे चले आते हैं।

"मोहन की लीला मधुर, भक्तन हितकारी।
बँध गये ऊखल संग , गोबर्धन गिरिधारी ।।"


   






Sunday, 16 August 2015

Durga Ma Ki Aarti (ओम् जग जननी जय जय ) ।

 
 " नीरांजनं सुमंगल्यम् कर्पूरेण समन्वितम् ।
   चन्द्रार्कवन्हि सदृशं महादेवी नमोस्तुते  ।।"

जग जननी जय जय, माँ जग जननी जय जय ।
भयहारिणी भवतारिणी भवभामिनि जय जय  ।।१ ।।ओम् जग जननी 

तू ही सत-चित-सुखमय , शुद्ध ब्रह्मरूपा  ।
सत्य सनातन सुन्दर , पर-शिव सुर भूपा ।।२ ।।ओम् जग जननी

आदि अनादि अनामय , अविचल अविनाशी ।
अमल अनन्त अगोचर , अज आनन्द राशी ।।३।।ओम् जग जननी 

अविकारी अघहारी , अकल कलाधारी    ।
कर्ता विधि भर्ता हरि, हर संहारकारी ।।४ ।।ओम् जग जननी

तू विधिवधू , रमा तू , उमा महामाया    ।
मूलप्रकृति विद्या तू , तू जननी , जाया।।५।।

राम ,कृष्ण तू सीता, ब्रजरानी राधा    ।
तू वांछाकल्पद्रूम , हारिणि सब बाधा  ।।६ ।।ओम् जग जननी

दशविद्या, नवदुर्गा ,  नाना शस्त्र करा    ।
अष्टमातृका , योगिनि , नव नव रूप धरा ।।७ ।।ओम् जग जननी

तू परधाम निवासिनि , महाविलासिनि तू   ।
तू ही शमशान विहारिनि , ताण्डवलासिनि तू ।।८ ।।ओम् जग जननी

सुर-मुनि-मोहिनि सौम्या , तू शोभाधारा     ।
विवसन विकट-सरुपा ,  प्रलयमयी धारा ।।९।।ओम् जग जननी

तू ही स्नेह-सुधामयी , तू अतिगरलमना   ।
रत्न विभूषित तू ही , तू ही अस्थितना    ।।१०।।ओम् जग जननी

मूलाधारनिवासिनि , इह पर सिद्धि प्रदे   ।
कालातीता काली , कमला तू वर दे   ।।११।।ओम् जग जननी

शक्ति शक्तिधर तू ही , नित्य अभेदमयी   ।
भेद प्रदर्शिनी वाणी , विमले  वेदत्रयी  ।।१२।।ओम् जग जननी

हम अतिदीन दुखी माँ , विपद जाल घेरे   ।
हैं कपूत अति कपटी , पर बालक तेरे    ।।१३।।ओम् जग जननी

निज स्वभाववश जननी , दया दृष्टि कीजै  ।
करूणा कर करूणामयि , चरण -शरण दीजै ।।१४ ।।ओम् जग जननी








Thursday, 13 August 2015

Bhagwan Shankar Ke 108 Nam (भगवान शंकर के १०८ नामों का वर्णन )

।७१.१. ओम् शिवाय नम:
२. ओम् महेश्वराय नम:
३. ओम् शम्भवे नम:
४. ओम् पिनाकिने नम:
५. ओम् शशिशेखराय नम: 
६. ओम् वामदेवाय नम: 
७. ओम् विरूपाक्षाय नम: 
८. ओम् कपर्दिने नम:
९. ओम् नीललोहिताय नम:
१०. ओम् शंकगय नम:
११. ओम् शूलपाणिने नम:
१२. ओम् खट्वांगिने नम: 
१३. ओम् विष्णुवल्लभाय नम:
१४. ओम् शिपिविष्टाय नम: 
१५. ओम् अम्बिकानाथाय नम:
१६. ओम् श्रीकण्ठाय नम: 
१७. ओम् भक्तवत्सलाय नम:
१८. ओम् भवाय नम: 
१९. ओम् शर्वाय नम: 
२०. ओम् त्रिलोकेशाय नम:
२१. ओम् शितिकण्ठाय नम:
२२. ओम् शिवप्रियाय नम:
२३. ओम् उग्राय नम:
२४. ओम् कपालिने नम:
२५. ओम् कामारये नम:
२६. ओम् अन्धकासुरसूदनाय नम:
२७. ओम् गंगाधराय नम:
२८. ओम् ललाटक्षाय नम:
२९. ओम् कलिकालाय नम:
३०. ओम् कृपानिधये नम:
३१. ओम् भीमाय नम:
३२. ओम् परशुहस्ताय नम:
३३. ओम् मृगपाणये नम:
३४. ओम् जटाधराय नम:
३५. ओम् कैलाशवासिने नम:
३६. ओम् कवचिने नम:
३७. ओम् कठोराय नम:
३८. ओम् त्रिपुरान्तकाय नम:
३९. ओम् वृषंगिने नम:
४०. ओम् वृषभारूढाय नम:
४१. ओम् भस्मोदूधूलितविग्रहाय नम:
४२.ओम् सामप्रियाय नम:
४३. ओम् स्वरभयाय नम:
४४. ओम् त्रयीमूर्तये नम:
४५. ओम् अनीश्वराय नम:
४६. ओम् सर्वज्ञाय नम:
४७. ओम् परमात्मने नम:
४८. ओम् सोमसूर्याग्रिलोचनाय नम:
४९. ओम् हविषे नम: 
५०. ओम् यज्ञमयाय नम:
५१. ओम् सोमाय नम:
 ५२. ओम् पंचवक्त्राय नम: 
५३. ओम् सदाशिवाय नम:
५४.  ओम् विश्वेश्वराय नम:
 ५५. ओम् वीरभद्राय नम:
५६. ओम् गणनाथाय नम:
५७.  ओम् प्रजापतये नम:
५८. ओम् हिरण्यरेतसे नम: 
५९. ओम् दुर्धर्षाय नम:
६०.ओम् गिरीशाय नम:
६१. ओम् गिरिशाय नम:
६२. ओम् अनघाय नम: 
६३. ओम् भुजंगभूषणाय नम:
६४. ओम् भर्गाय नम:
६५. ओम् गिरिधन्वने नम: 
६६. ओम् गिरिप्रियाय नम: 
६७. ओम् कृत्तिवाससे नम:
६८. ओम् पुरारातये नम:
६९. ओम् भगवते नम: 
७०. ओम् प्रमथाधिपाय नम:
७१. ओम् मृत्युंजाय नम:
७२. ओम् सूक्ष्मतनवे नम:
७३. ओम् जगद्वयापिने नम:
७४. ओम् जगदगुरवे नम:
७५. ओम् व्योमकेशाय नम:
७६. ओम् महासेन-जनकाय नम:
७७. ओम् चारूविक्रमाय नम:
७८. ओम् रुद्राय नम:
७९. ओम् भूतपये नम: 
८०. ओम् स्थाणवे नम:
८१. ओम् अहिर्बुधन्याय नम:
८२. ओम् दिगम्बराय नम:
८३. ओम् अष्टमूर्तयै नम:
८४. ओम् अनेकात्मने नम:
८५. ओम् सात्त्विकाय नम:
८६. ओम् शुद्धविग्रहाय नम:
८७. ओम् शाश्वताय नम:
८८. ओम् खण्डपरशवे नम:
८९. ओम् रजसे नम:
९०. ओम् पाशविमोचनाय नम:
९१. ओम् मृडाय नम: 
९२. ओम् पशुपतये नम:
९३. ओम् देवाय नम:
९४. ओम् महादेवाय नम: 
९५. ओम् अव्ययाय नम: 
९६. ओम् हरिपूषणे नम: 
९७. ओम् दन्तभिक्षे नम: 
९८. ओम् अव्यग्राय नम: 
९९. ओम् दक्षाधरहराय नम: 
१००. ओम् हराय नम: 
१०१. ओम् भगनेत्रभिदे नम: 
१०२. ओम् अव्यक्ताय नम: 
१०३. ओम् सहस्त्राक्षाय नम: 
१०४. ओम् सहस्त्रपदे नम: 
१०५. ओम् अपवर्गप्रदाय नम: 
१०६. ओम् अनन्ताय नम: 
१०७. ओम् तारकाय नम: 
१०८. ओम् परमेश्वराय नम:

इति शिवाष्टोत्तरशतनामावलि: सम्पूर्णम् ।


Tuesday, 11 August 2015

Dena Ho To Deejiye ,Janam Janam ka Sath. (Krishana Bhajan )




देना हो तो दीजिये , जनम -जनम का साथ ।
अब तो कृपा कर दीजिये , जनम-जनम का साथ।
मेरे सिर पर रख दे गिरधारी,अपने ये दोनो हाथ ।देना हो ---

देने वाले श्याम प्रभु से ,धन और दौलत क्या माँगे ।
श्याम प्रभु से माँगे भी तो, नाम और इज्जत क्या माँगे।
मेरे जीवन में अब कर दे ,तू कृपा की बरसात ।देना हो --

श्याम तेरे चरणों की धूलि , धन दौलत से मँहगी है ।
एक नजर कृपा की कान्हा , नाम इज्जत से मँहगी है।
मेरे दिल की तमन्ना यही है, करूँ सेवा तेरी दिन रात ।देना हो ---

झुलस रहे हैं गम की धूप में, प्यार की छाया कर दे तू ।
बिन माँझी की नाव चले न , अब पतवार पकड़ ले तू ।
मेरा रस्ता रौशन कर दे , छाई अँधियारी रात । देना हो तो---

सुना है हमने शरणागत को , अपने गले लगाते हो ।
अरे ऐसा हमने क्या माँगा , जो देने से घबराते हो ।
चाहे जैसे रख बनवारी, बस होती रहे मुलाकात ।
   देना हो तो दीजिये , जनम-जनम का साथ ।
 अब तो कृपा कर दीजिये , जनम-जनम का साथ।




Reference: Ramesh bhai ojha ji










                          


Saturday, 8 August 2015

Sharan Me Aa Para Tere , Prabhu Mujhko Na Thukarana (शरण में आ पड़ा तेरे,प्रभु मुझको न ठुकराना)। (Krishna Bhajan)

शरण में आ पड़ा तेरे, प्रभु मुझको न ठुकराना ।

पकड़ लो हाथ अब मेरा, नाथ देरी लगाना ना ।


तेरा है नाम दुनियाँ में , पतितपावन सभी जानें,

पतितपावन सभी जानें --२  

देखकर एक नजर प्रभुजी , नजर मुझसे हटाना ना।

शरण में आ पड़ा तेरे, प्रभु मुझको न ठुकराना ।


काल की है नदी भारी , बहा जाता हूँ धारा में,

बहा जाता हूँ धारा में ।

पकड़ लो हाथ अब मेरा , नाथ देरी लगाना ना ।


बहा दो प्रेम की गंगा , दिलों में प्रेम का सागर ,

दिलों में प्रेम का सागर ।

ये जीवन प्रेम से बीते , हमें आकर सिखा देना ।

शरण में आ पड़ा तेरे , प्रभु मुझको न ठुकराना ।


Saturday, 1 August 2015

Yashoda Hari paalne Jhulave Ri. Shrikrishana Lori







Maiyaa Yashoda apne Kanhaiya ko sula rahin hain, parantu  natkhat Kanhaiya ko nind nahi aa rahi hai, isliye Yashoda ji tarah tarah se jatan karti hain,  kabhi thapki deti hain, toh kabhi lori sunati hain, kabhi Kanhaiya ko dikhane ke liye swayam sone ka abhinaye karti hain, jisse Kanhaiya so jaye ,lekin Kanhaiya kabhi sote hain toh kabhi ankhein khol dete hain.

Maha kavi "Surdasji" is drishya ka varnan apne pad me is prakar karte hain:



        Yashoda hari paalne jhulave ri
Yashoda hari paalne jhulave ri
Halrave, dulraye,malhave ri
joyi soyi kachu kachu gaave
Yashoda hari paalne jhulave ri -2

Mere lal ko aao nindniya
kahe na aani suaave
tu kaahe na vegi si aave
toh ko kanha bulaave
Yashoda hari paalne jhulave ri -2

kab hun palak hari moondi let hain,
kab hun adhar farkave,
sovat jani maon ho rahin,
kari-kari shayan batave,
Yashoda hari paalne jhulave ri -2

yehi antar akulaaye uthe hari,
jasho mati madhur gaave,
jo sukh sur amar muni durlabh,
so nand bhamini paave

Yashoda hari paalne jhulave ri
Halrave, dulraye,malhave ri
joyi soyi kachu kachu gave
Yashoda hari paalne jhulave ri -2



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