Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Friday, 27 October 2017

Tulsi Devi Ko Namaskar ( तुलसी देवी को नमस्कार ।)




या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुष्पावनी
    रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी ।
प्रत्यासत्तिविधायिनी भगवत: कृष्णस्य संरोपिता
     न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नम: ।।

जो दर्शन पथ में आने पर सारे पाप-समुदाय का नाश कर देती है, स्पर्श किये जाने परशरीर को पवित्रबनाती है, प्रणाम किये जाने पर रोगों का निवारण करती है, जल से सींचे जाने पर यमराज को भी भय पहुँचाती है, आरोपित किये जाने पर भगवान् श्रीकृष्ण के समीप ले जाती है और भगवान् के चरणों में चढ़ाये जाने पर मोक्षरूपी फल प्रदान करती है, उस तुलसीदेवी को नमस्कार है। (  (   (पद्मपुराण )

Saturday, 7 October 2017

Bhajman Ram charan sukhdai

भजमन राम चरण सुखदायी,भजमन राम चरण सुखदायी।

जेहि चरणन से निकसि सुरसरि,शंकर जटा समायी
जटा शंकरी नाम परयो है , त्रिभुवन  तारण  आयी ।
भजमन राम चरण सुखदायी ।

जेहि चरणन की चरण पादुका , भरत लियो लव लाई
सोई चरण केवट धोय लीने  , तब हरि नाव चढ़ाई ।
भजमन राम चरण सुखदायी।

जेहि चरणन संतन जन सेवत, सदा रहत सुखदायी
सोई चरण गौतम ऋषि नारी, परसि परम पद पाई।
भजमन राम चरण सुखदायी।

दंडक वन प्रभु पावन कीन्हें, ऋषियन त्रास मिटाई
सोई प्रभु त्रिलोक के स्वामी, कनक मृगा संग धाई।
भजमन राम चरण सुखदायी।

शिवसनकादिक अरु ब्रह्मादिक, शेष सहस मुख गाई
तुलसीदास मरूत सुत की प्रभु , निज मुख करत बड़ाई।
भजमन राम चरण सुखदायी,भजमन राम चरण सुखदायी।


Wednesday, 24 May 2017

दुर्गा सप्तशती के सिद्ध मन्त्र ( संस्कृत में ।)

           



१-  या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
     नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।( शक्ति दायी मंत्र )

२-  शरणागत दीनार्थ परित्राण परायणे।
   सर्वस्यार्ति हरे देवी नारायणी नमोस्तुते।। ( आपत्ति उद्धारक मंत्र )

   ३-  सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते ।
    भयेभ्यःस्त्राहि नो देवि दुर्र्गे देवि नमोस्तुते ।। ( भय विनाशक मंत्र )

 ४-  करोतु सा न: शुभहेतुरीश्वरी ।

शुभानि भद्राण्यभिहृन्तु चापद: ।। ( विपत्तिनाशक तथा शुभदायक मंत्र )

५- ओम् जयन्ती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते ।। ( महामारी नाशक  मंत्र )

 ६-    देहि सौभाग्यमारोग्यम् देहि में परमं सुखम् ।

      रूपम् देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जाहि ।।(  सौभाग्य तथा आरोग्य कारक मंत्र। ) 

७- पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृतानुसारिणीम् ।

तारिणीम दुर्ग संसार-सागरस्य कुलोद्भवाम् ।। ( सुलक्षणा पत्नी प्राप्ति के लिये )

 ८- ओम् कात्यायनि महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी। 

नन्दगोप सुते  देवि  पतिं में  कुरू ते  नम: ।। ( इच्छित पति प्राप्ति के लिये )

 ९ - सृष्टि - स्थिति विनाशानो शक्ति भूते सनातनी ।

 गुणाश्रये-गुणमये  नारायणि  नमोस्तुते    ।। ( शक्ति प्राप्ति के लिये )

१०- देवकीसुत गोविन्द: वासुदेव जगत्पते ।

देहि में तनयं कृष्ण: त्वामहं शरणं गत: ।। ( पुत्र प्राप्ति के लिये )







Thursday, 13 April 2017

Ma Durga Ke Pratham Swaroop 'Shailputri Mata ' Ki Puja

नवरात्र के प्रथम दिन घट स्थापन के बाद माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप 'माता शैलपुत्री' की पूजा करने का विधान है।शैल का अर्थ है हिमालय और हिमालय के यहाँ जन्म लेने के कारन इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है।पार्वती के रूप में इन्हें भगवान शंकर की पत्नी के रूप में भी जाना जाता है।इनका वाहन वृषभ ( बैल ) होने के कारण इन्हें वृषभारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है।इनके दाएँ हाथ में त्रिशूल है और बाएँ हाथ में इन्होंने कमल धारण किया हुआ है।
          शास्त्रों में इनसे जुड़ी एक कहानी का उल्लेख है कि प्राचीन काल में जब सतीजी के पिता प्रजापति दक्ष यज्ञ कर रहे थे तो इन्होंने सभी देवताओं को इस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये आमंत्रित किया लेकिन अपने जमाता, भगवान भोले शंकर और अपनी पुत्री सती को निमन्त्रण नहीं भेजा।सतीजी को अपने पिता के यज्ञ में जाने की तीब्र इच्छा थी।उनकी व्यग्रता देखकर महादेव ने कहा, सम्भवत: प्रजापति दक्ष हमसे रूष्ट हैं, इसलिये उन्होंने हमें आमंत्रित नहीं किया होगा।शंकरजी के इस वचन से सतीजी सन्तुष्ट नहीं हुई,और जाने की जिद करने लगीं।उनकी वेचैनी देखकर महादेव ने उन्हें जाने की अनुमति दे दिया।
                  सतीजी जब अपने पिता के घर पहुँची तो सिर्फ माँ ने ही उन्हें स्नेह दिया तथा पुत्री को देखकर प्रसन्न हुई।घर के अन्य सदस्य ने ना तो ठीक से उनसे बातचीत किया और ना ही उनका हाल समाचार पूछा,बल्कि महादेव के उपर व्यंगात्मक छीटाकशी भी की।पिता दक्ष ने भी महादेव के  प्रति व्यंगात्मक कुछ बाते कहीं जो सतीजी को उचित नहीं लगा । अपने पति का तिरस्कार होता देख उन्होंने योगाग्नि से अपने आप को भस्म कर लिया।जब भगवान शंकर को सती के भस्म होने के विषय में पता चला तो वे अत्यधिक क्रोधित हो गये और उन्होंने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करवा दिया।यही सतीजी अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाई।शैलपुत्री का विवाह भगवान शंकर से हुआऔर वो भगवान शंकर की पत्नी बन गईं।ऐसा कहा जाता है कि माँ दुर्गा के इस शैलपुत्री स्वरूप का पूजन करने से उपासक की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती है और कन्याओं को मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है।इनकी पूजा में लाल फूल,सिन्दूर नारियल और घी के दीपक का प्योग होता है।माँ शैलपुत्री का पूजन और स्तवन निम्न मंत्र से किया जाता है।

                         ' वन्दे वांछितलाभाय , चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
                           वृषारूढ़ां शूलधरां,   शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ।।'
   अर्थात् मैं मनोवांछित लाभ के लिये अपने मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाली , वृष पर सवार रहने वाली , शूलधारिणी और यशस्विनी माँ शैलपुत्री की वंदना करता हूँ।

Tuesday, 11 April 2017

Mai Ram Nam Gun Gaun मैं राम नाम गुण गाऊँ

मैं   राम  नाम  गुण  गाऊँ ,भगवन राम नाम गुण गाऊँ ।
तेरा  सहारा   लेकर  भगवन  भवसागर  तर   जाऊँ  ।।

विपदा  के  मारों  का  तू  है , जनम - जनम  का  साथी ,
तेरे  ही  नाम  से  रौशन  दुनिया  की  अँधियारी  वाती  ।
मन  मन्दिर  में  निशदिन  भगवन  प्रेम  की  जोत  जलाऊँ ।
मैं  राम  नाम  गुण  गाऊँ------------ ।

कहते  हैं  कण - कण में  प्रभुजी  तेरा  रूप  समाया  ,
फिर भी मैं भगवन देख  न  पाऊँ , क्या  ये  तेरी  माया ।
मुझको  दान  करो  वह अँखियाँ , जिनसे  मैं  दर्शन पाऊँ 
मैं  राम  नाम  गुण  गाऊँ ------------।

Sunday, 2 April 2017

माँ दुर्गा का सातवां रूप ' माँ कालरात्रि'

नवरात्र के सातवें दिन दुर्गाजी के सातवें स्वरूप माँ कालरात्रि की पूजा होती है।इनका वर्ण अंधकार रात्रि की तरह काला है ।बाल बिखरे हुये हैं और गले में माला बिजली की तरह देदीप्यमान है।इन्हें तमाम आसुरि शक्तियों का विनाश करने वाला बताया गया है।इनके तीन नेत्र और चार हाथ हैं ।इनके एक हाथ में खड़ग है तो दूसरे हाथ में लौह अस्त्र है, तीसरे हाथ मेंअभयमुद्रा है और चौथे हाथ में वरमुद्रा है।इनका वाहन गर्दभ अर्थात गधा है।कालरात्रि नाम के अनुरूप ,एैसी मान्यता है कि माँ अपने भक्तों की रक्षा काल से भी करती हैं अर्थात उनकी अकाल मृत्यु नहीं होती।इन्हें सभी सिद्धियों की देवी भी कहा जाता है।इसलिये तंत्र-मंत्र की उपासना करने वाले इसदिन इनकी विशेष रूप से पूजा करते हैं।इनके नाम के उच्चारण मात्र से ही सभी भूत,प्रेत,राक्षस,दानव और सभी पैशाचिक शक्तियाँ भाग जाती हैं।इनकी पूजा में गुड़ के भोग का विशेष महत्व है।माँ कालरात्रि की पूजा,अर्चना निम्न मंत्र से किया जाता है------ 

               एकवेणी जपाकर्ण, पूरा नग्ना खरास्थिता ।
                लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी, तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।
               वामपादोल्लसल्लोह, लताकंटकभूषणा ।
                वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा , कालरात्रिभयंकरी ।।

 अर्थात एक वेणी ( बालों की चोटी ) वाली, जपाकुसुम ( अड़हुल ) के फूल की तरह लाल कर्ण वाली, उपासक की कामनाओं को पूर्ण करने वाली,गर्दभ पर सवारी करने वाली,लंबे होठों वाली, कर्णिका के फूलों की भांति कानों से युक्त,तैलीय त्वचा वाली, अपने बांये पैर में चमकने वाली लौह लता धारण करने वाली,कांटों की तरह आभूषण पहनने वाली, बड़े ध्वज वाली और भयंकर लगने वाली कालरात्रि माँ हमारी रक्षा करें।

Saturday, 1 April 2017

Ma Durga ka Chhatha Roop 'Ma Katyayani'माँ दुर्गा का छठा रूप ' माँ कात्यायनी'

नवरात्र के छठे दिन दुर्गाजी के छठे स्वरूप माँ कात्यायनी की पूजा और अर्चना की जाती है।ऐसा विश्वास है कि इनकी उपासना करने से अर्थ , धर्म , काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।माँ ने कात्य गोत्र के महर्षि कात्यायन के यहाँ पुत्री रूप में जन्म लिया,इसलिए इनका नाम कात्यायनी पड़ा।इनका रंग स्वर्ण की भांति अत्यन्त चमकीला है और इनकी चार भुजायें हैं।
               इनकी दाईं ओर के ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में है और नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में।बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में खड़ग अर्थात तलवार है और नीचे वाले हाथ में कमल का फूल है।इनका वाहन भी सिंह है।
     शास्त्रों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि महर्षि कात्यायन ने सर्वगुण संपन्न पुत्री पाने के उद्देश्य से भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या की और इन्हें पुत्री के रूप में कात्यायनी की प्राप्ति हुई।क्योंकि ये ब्रजभूमि की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं, संभवत: इसलिए ब्रज प्रदेश की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिये यमुना तट पर इन्हीं माँ कात्यायनी की पूजा की थी।
     इनके पूजन में शहद का विशेष महत्व बताया गया है।इसलिय इन्हें मधु का भोग लगाया जाता है।इनके उपासक को किसी प्रकार का कोई भय नहीं रहता है और वह सब तरह के पापों से मुक्त हो जाता है।इन्हें शोध की देवी कहा जाता है।उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों को इनकी पूजा अवश्य करनी चाहिये।इनकी पूजा अर्चना तथा स्तवन निम्न मन्त्र से किया जाता है।

                   चन्द्रहासोज्जवलकरा , शार्दूलवरवाहना ।
                    कात्यायनी शुभं दद्यात् , देवी दानवघातनी।।
अर्थात् चन्द्रहास की भाँति देदीप्यमान , शार्दूल अर्थात शेर पर सवार और दानवों का विनाश करने वाली माँ कात्यायनी हम सबके लिये शुभदायी हों।